Saturday, October 15, 2011

कांग्रेस को अच्छे चेहरे की जरूरत एम.जे. अकबर

ऑल इंडिया रेडियो को बिना शर्त, पूरी-पूरी बधाई। सरकार का यह आधिकारिक प्रसारणकर्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से मिली आधिकारिक सूचना से बेवकूफ नहीं बना, भले ही उस सूचना को पार्टी में प्रचलित तमाम उद्देश्यों के लिए अधिकृत जनार्दन द्विवेदी ने निजी तौर पर पढ़ा था।

द्विवेदी ने श्रीमती सोनिया गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण अनुपस्थिति में कांग्रेसी मामलों को देखने के लिए अधिकृत चार लोगों के समूह में एके एंटनी को शीर्ष पर रखा था, जबकि राहुल गांधी या तो नंबर दो पर थे या तीन पर- यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके संस्करण पर विचार कर रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो में ऐसी कोई नासमझी नहीं थी। इसने अपने सभी बुलेटिनों में राहुल गांधी के शीर्ष पर होने पर ही जोर दिया। रेडियो सही है।

अपने सभी गुणों के लिए, जिनमें बिना पलक झपकाए वफादारी निभाना सबसे महत्वपूर्ण है, एंटनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी नामांकित नहीं हुए हैं। राहुल गांधी हैं। अनिश्चितता इसके समय को लेकर है, न कि हां या नहीं को लेकर। यह धारणा लगातार बनी हुई है कि शायद राहुल गांधी अपनी विरासत को संभालने के लिए एकदम से तैयार नहीं हैं। खासतौर से, जब 2012 के राजनीतिक सीजन में भारी उथल-पुथल के आसार हैं, इसे लेकर जितने मुंह उतनी ही बातें हैं।

उनके सबसे जोशीले समर्थक मानते हैं कि अगर 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो संदेह के सारे बादल छंट जाएंगे। लेकिन इससे एक और प्रश्न उभरता है: ‘अच्छे’ की परिभाषा क्या है? संभवत: सूची में एक साफ संदेश है। अगर परिवर्तन की प्रक्रिया में किसी अंतरिम भूमिका की संभावना बनती है, तो फिर यह भूमिका एंटनी द्वारा निभाई जाएगी, न तो बहुत सक्षम प्रणव मुखर्जी द्वारा, न हमेशा के अभिलाषी या पीसी चिदंबरम द्वारा। छलांग लगाती महत्वाकांक्षाओं पर बहुत ठंडा पानी फिर गया है।

शायद हमें इस बारे में पहला संकेत मिल चुका है कि अगले साल राष्ट्रपति भवन के लिए कांग्रेस उम्मीदवार कौन हो सकता है। 2011 प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने का वर्ष रहा है। श्रीमती शीला दीक्षित, जो एक आदर्श राष्ट्रपति रही होतीं, उन पर कॉमनवेल्थ गेम्स मामले में आई सीएजी रिपोर्ट के जरिए कीचड़ उछला है। और प्रधानमंत्री कार्यालय के चारों तरफ भी जलस्तर बढ़ रहा है।

लेकिन एंटनी की छवि उनकी पारंपरिक केरलाई लुंगी की तरह झक सफेद बनी हुई है। न ही वे भरोसे की कमी से पीड़ित हैं, जो प्रणव मुखर्जी को हर बार सताती है, जब-जब प्रमोशन की बात आती है। बेशक, जब भी कड़ी मेहनत की जानी होती है, तो प्रणव मुखर्जी पर पूरा भरोसा किया जाता है।

2012 कांग्रेस की संभावनाओं के लिए बेहद निर्णायक है, जो इस साल मृतक-संसार में फिसल गई है। यह अच्छा होने के लिए इसका आखिरी मौका है। इसके लिए खुशकिस्मती की बात है कि इसका कोई भी गठबंधन सहयोगी सरकार की अस्थिरता से फायदा उठाने की हालत में नहीं है, वरना तत्काल कोई चुनाव कांग्रेस के लिए विनाशक हो सकता है। लेकिन चंगा होने के लिए सबसे पहले जरूरी है नेतृत्व और दिशा को लेकर स्पष्टता।

श्रीमती सोनिया गांधी की अचानक आई बीमारी राहुल गांधी के लिए प्रगति की दोहरी छलांग का राजनीतिक मौका बन सकती है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पहली छलांग और फिर डॉ. मनमोहन सिंह की कुर्सी पर। यहां यह दर्ज होना चाहिए कि प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी को नियमित तौर पर न्योता भेजते ही रहे हैं, इसलिए इस बदलाव से दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह राहुल गांधी को अपने आप को दिखाने का दो साल का मौका देगा, जबकि देश को उनकी क्षमताओं को समझने का अवसर मिलेगा। उन्होंने सत्ता से एक सुविचारित दूरी बनाए रखी है, लेकिन यह तो मुकरना हुआ।

किसी समस्या के समाधान के तौर पर कभी कोई समूह गठित नहीं होता। यह तो समाधान मिलने तक महज एक पुल होता है। कांग्रेस के लिए बदतर संभावना यह हो सकती है कि समिति की ओर मुड़ना पड़े। श्रीमती सोनिया गांधी जानती हैं कि पार्टी के सामने खड़ी चुनौतियां उनकी वापसी के वक्त तक बढ़ने ही वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिक्कतों के पिटारे को खोल दिया है, जिससे प्रतिष्ठान ने बड़ी चतुराई से सील कर दिया था।

कोर्ट ने पुलिस को वोट के लिए नोट कांड में कार्रवाई के लिए कहा है, जिसने 2008 में परमाणु समझौते के दौरान हुए मतदान में सरकार को बचाया था। कोई जानकारी नहीं कि प्रसुप्त पुलिस द्वारा कब यह कार्रवाई की जाएगी। पिटारे में अभी भी आग बाकी है, जो सरकार में किसी को भी जला सकती है। और कांग्रेस फायर ब्रिगेड के पास सीमित उपकरण बचे हैं। यदि बहुत सारे चेहरे झुलसकर काले पड़ जाते हैं, तो कांग्रेस को एक नए चेहरे की जरूरत होगी।

अगर राहुल तैयार ही नहीं होते हैं, तो यह चेहरा एंटनी हो सकते हैं। लेकिन आपके लिए राहुल गांधी पर दांव लगाना ज्यादा बुद्धिमानी का काम होगा। ऐसी अभूतपूर्व हलचल के बीच अच्छी खबर यह है कि सीएजी जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं और इसके प्रशंसनीय मुखिया विनोद राय राजनीतिक वर्ग रूपी ऊंट को पहाड़ के नीचे ले आए हैं। जो भारत के भ्रष्टाचार को लेकर हंसते हैं, उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सराहना के लिए कुछ पल तो निकालने ही चाहिए।

भारत में चीन की तरह तानाशाही नहीं है, जिसने वेंशोउ में हुई ट्रेन दुर्घटना में सरकारी लापरवाही को लेकर होने वाली रिपोर्टिग पर सेंसर लगा दिया। और फिर जांच समिति में रेलवे मंत्रालय के दूसरे नंबर के महत्वपूर्ण व्यक्ति को रख दिया। भारत में अभियुक्त ही न्यायाधीश नहीं होता। देश, सरकार से बड़ा है।

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