मणिपुर वूमेन गन सर्वायवर्स नेटवर्क की संस्थापक बीनालक्ष्मी नेप्राम ने मुझसे अपनी सुपरिचित व्यग्रता के साथ पूछा: ‘आप इरोम शर्मिला के एक दशक से चल रहे अनशन का कवरेज उतनी ही मुस्तैदी से क्यों नहीं करते, जैसा आपने अन्ना हजारे के तेरह दिन के अनशन का किया था?’ एक लाइव प्रोग्राम में स्टेज पर पूछे गए इस सवाल से बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक कमजोर-सा जवाब दिया: ‘शायद इम्फाल की तुलना में रामलीला मैदान टीवी स्टूडियो के अधिक निकट है।’
‘दूरी की मजबूरी’, यह इस सवाल के लिए महज एक अधूरी सफाई ही हो सकती है कि आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर्स एक्ट (एएफएसपीए) के उन्मूलन की मांग को लेकर नवंबर 2000 में अनशन शुरू करने वाली एक 39 वर्षीय महिला के संघर्ष की कहानी टीवी चैनलों की सुर्खियां क्यों नहीं बनी।
हां, जब मणिपुरी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया था, तब जरूर राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान कुछ समय के लिए इस त्रासदी की ओर गया था। लेकिन इस मसले को पूर्वोत्तर की परंपरागत उपेक्षा के चश्मे से देखना वास्तव में इस मौजूदा हकीकत की ही उपेक्षा करना होगा कि मीडिया और प्रबुद्ध नागरिकों की नजरों में ‘जनतांत्रिक’ प्रतिरोध के क्या मायने हैं।
एक क्षण के लिए इरोम शर्मिला के साहसपूर्ण संघर्ष को भूल जाएं और मेधा पाटकर के बारे में विचार करें। इसी साल मई में पाटकर ने मुंबई में झुग्गी-झोपड़ियों को हटाए जाने के विरोध में नौ दिन का अनशन किया था। उनके अनशन ने स्थानीय अखबारों का ध्यान जरूर खींचा था, लेकिन टीवी कैमरे इफरात में नजर नहीं आए थे।
झुग्गी-झोपड़ियों को हटाना एक ऐसा मसला है, जो शहरी मध्य वर्ग को असहज कर देता है। यह वर्ग मेधा पाटकर को एक ‘ट्रबल मेकर’ की तरह देखता है, फिर चाहे बांध परियोजना प्रभावितों के पुनर्वास की मांग हो या सिंगुर में टाटा नैनो प्लांट का विरोध। लेकिन जब वे ही मेधा पाटकर टीम अन्ना के मंच पर खड़ी होकर तिरंगा फहराती हैं तो वे साहस व आदर्शवाद की प्रतिमूर्ति बन जाती हैं।
या फिर वकील-सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण के बारे में ही विचार करें। चंद माह पूर्व जब वे कथित माओवादियों के लिए केस लड़ रहे थे या अरुंधती राय की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का समर्थन कर रहे थे तो मीडिया के एक वर्ग ने उन्हें ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दे दिया था। आज वही मीडिया उन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष कर रहे एक योद्धा की तरह देख रहा है। जब भूषण और पाटकर ने यथास्थिति को चुनौती दी तो उन्हें निशाना बनाया गया, लेकिन जब वे धारा के साथ बहने लगे तो उन्हें नायकों-सा सम्मान दिया गया।
वास्तव में तथ्य यह है कि ‘भ्रष्टाचार विरोध’ एक ऐसा लोकप्रिय ब्रांड है, जो बहुतेरे लोगों को आकर्षित करता है। अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता की वजह थी उसका सरल और समावेशी चरित्र। यह एक ऐसा आंदोलन था, जो मेधा पाटकर, श्रीश्री रविशंकर और ओम पुरी के साथ ही लाखों अनाम भारतीयों को एक मंच पर ला सकता था। और यही अन्ना और इरोम शर्मिला के आंदोलन का भेद भी है।
एक आंदोलन को संगठित करने वाला माना जाता है तो दूसरे को विभाजित करने वाला। अन्ना का आंदोलन महज जनलोकपाल बिल के ब्योरों के बारे में ही नहीं था, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-मन में पैठे आक्रोश का एक सशक्त प्रतीक भी था। मध्य वर्ग के लिए अन्ना का तपश्चर्यापूर्ण आंदोलन उनकी अपनी उपभोक्तावादी जीवनशैली से विपरीत था, इसलिए अन्ना टोपी पहनने का मतलब था, कुछ देर के लिए ही, लेकिन एक संतुलन स्थापित करना। इस आंदोलन ने आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों को सहसा राजनीतिक रूप से भी सशक्त होने का अहसास कराया।
इसके विपरीत इरोम शर्मिला आम नागरिकों के समक्ष एक अधिक जटिल विकल्प प्रस्तुत करती हैं। मणिपुरियों के लिए वे एक स्थानीय नायिका हैं, जो सेना द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के विरोध की प्रतीक हैं। लेकिन देश के अन्य भागों के लोग उनके आंदोलन को एक ऐसे संघर्ष के रूप में देख सकते हैं, जो भारतीय राज्यसत्ता की संप्रभुता को प्रश्नांकित कर रहा है। मणिपुरी लोग एएफएसपीए को बुनियादी स्वतंत्रता का हनन करने वाली इकाई के रूप में देख सकते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी कम नहीं होंगे, जो उसे उग्रवाद से ग्रस्त क्षेत्र के लिए आवश्यक मानें।
इन अर्थो में इरोम शर्मिला के अनशन को राष्ट्रवादियों द्वारा ठीक उसी तरह भारतीय राज्यसत्ता को एक चुनौती माना जाएगा, जैसे वे जम्मू-कश्मीर के किसी लोकप्रियतावादी आंदोलन को भारतीय संप्रभुता के लिए एक खतरा मानते हैं।
लेकिन विडंबना है कि अन्ना और इरोम शर्मिला दोनों में ही कई समानताएं भी हो सकती हैं। जहां दोनों ही अनशन का इस्तेमाल प्रतिरोध के एक शांतिपूर्ण शस्त्र की तरह कर रहे हैं, वहीं वास्तव में वे राज्यसत्ता के दुरुपयोग पर सवालिया निशान भी लगा रहे हैं। सत्ता के दुरुपयोग की वजह है कुप्रशासन। जहां सुप्रशासन विफल हो जाता है, वहीं भ्रष्टाचार की विषबेल पनपती है। चाहे मणिपुर हो या जम्मू-कश्मीर, एएफएसपीए जैसे कठोर कानून को लागू करना वास्तव में एक प्रशासनिक संकट को दर्शाता है। वस्तुत: मणिपुर और जम्मू-कश्मीर ने हिंसा के कारण उतना कष्ट नहीं सहा है, जितना कि भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र के कारण।
इसीलिए हर वह व्यक्ति, जो एक सशक्त लोकपाल बिल की मांग कर रहा है, उसे एएफएसपीए के उन्मूलन की मांग का भी समर्थन करना चाहिए। और इसीलिए अन्ना हजारे को गंभीरतापूर्वक इरोम शर्मिला के इस अनुरोध पर विचार करना चाहिए कि वे मणिपुर आएं और उनके संघर्ष के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें। यह पूरी तरह एक प्रतीकात्मक यात्रा हो सकती है, लेकिन इससे यह जरूर होगा कि टीवी कैमरे मणिपुर की त्रासदी की ओर रुख करने को भी विवश हो जाएंगे, चाहे एक दिन के लिए ही सही।
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Saturday, October 15, 2011
संकटमोचक की लक्ष्मणरेखा - राजदीप सरदेसाई
आम धारणा यही रही है कि यूपीए में दो सत्ता केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में सत्ता केंद्र दो नहीं तीन हैं। यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी सर्वोच्च नेत्री हैं, लेकिन उनके पास प्रशासनिक उत्तरदायित्व नहीं हैं। यह जिम्मेदारी वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को सौंपी गई थी और कैबिनेट का प्रमुख होने के साथ ही उन्हें एक सीईओ-नुमा भूमिका भी निभानी थी।
लेकिन इन दोनों के साथ ही यूपीए में एक तीसरा सत्ता केंद्र भी था। भले ही यह तीसरा कोण बहुत जाहिर न रहा हो, लेकिन उसके महत्व से कभी इनकार नहीं किया जा सकता था। यूपीए में प्रणब मुखर्जी की भूमिका हमेशा एक वरिष्ठ मंत्री से अधिक रही है।
वास्तव में वे यूपीए के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) हैं और यह उनकी जिम्मेदारी रही है कि गठबंधन की राजनीति के समक्ष मुंह बाए खड़ी चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए। पिछले सात सालों से श्री मुखर्जी यूपीए द्वारा लिए जाने वाले लगभग हर राजनीतिक निर्णय या महत्वपूर्ण नीति के लिए ‘गो टु पर्सन’ रहे हैं।
विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक मसलों का हल करने के लिए बनाए गए 32 मंत्रियों के समूह के वे अध्यक्ष थे। अब मंत्रियों की संख्या 32 से घटकर 10 तक पहुंच गई है, लेकिन इससे यूपीए में श्री मुखर्जी की भूमिका और महत्व कम नहीं हो जाते।
यूपीए में संकट की किसी भी घड़ी में 13 तालकटोरा रोड स्थित मुखर्जी का निवास केंद्र बिंदु बन जाता है, जबकि इसकी तुलना में 7 रेसकोर्स रोड कभी-कभी परिधि पर ही बना रहता है। इससे यूपीए सिस्टम की सीमाएं ही उजागर होती हैं कि एक व्यक्ति से यह अपेक्षाएं की जा रही हैं कि वे तेलंगाना से लेकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर समस्या का समाधान करेंगे।
यह एक ऐसे सिस्टम की सीमाएं हैं, जिसके प्रधानमंत्री ने कभी कोई लोकप्रिय चुनाव नहीं जीता और जिसकी अध्यक्षा रोजमर्रा की राजनीति की कठोरताओं से दूरी बनाए रखना पसंद करती हैं। शायद, यह व्यवस्था यूपीए के दोनों शीर्ष व्यक्तियों के अनुरूप है।
एक उत्कृष्ट प्रशासनिक अधिकारी के रूप में डॉ सिंह कभी भी गठबंधन की राजनीति की रस्साकशी को लेकर सहज नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री की शैली कुछ इस तरह की है कि वे राजनीतिक निर्णयों के लिए सीधे जिम्मेदारी लेने से बचना पसंद करते हैं।
यहां भारत-अमेरिका एटमी डील एक महत्वपूर्ण अपवाद है। डॉ सिंह के लिए एक वांछित विकल्प यह रहा है कि उनके स्थान पर मंत्रियों के एक समूह द्वारा निर्णय लिया जाए। श्रीमती गांधी ने भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के जरिये ही राजनीतिक तंत्र में हस्तक्षेप करना पसंद किया है।
यह परिषद ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिन्हें किन्हीं मतदाताओं की चिंता करने की जरूरत नहीं है, लेकिन जिनके पास ये अधिकार और स्वतंत्रता है कि वे सरकार के निर्णयों को प्रभावित कर पाएं।
ऐसी स्थिति में श्री मुखर्जी यूपीए के सबसे बड़े संकटमोचक बनकर तो उभरे, लेकिन इसके साथ ही उनसे एक ‘लक्ष्मणरेखा’ के भीतर रहने की अपेक्षा भी की जाती रही। वह रेखा, जो यूपीए के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा तय की गई है।
उदाहरण के तौर पर वे प्रधानमंत्री बनने की कामना नहीं कर सकते। यूपीए नेतृत्व प्रथम परिवार के प्रति वफादारी की बुनियाद पर ही संचालित होता है और किन्हीं कारणों से 10 जनपथ हमेशा से श्री मुखर्जी के प्रति सतर्क ही रहा है।
संभवत: यह इतिहास का बोझ है। वह कहानी, जो कभी पूरी तरह सत्यापित नहीं हो सकी, कि किस तरह उन्होंने 1984 में इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी बनने का प्रयास किया था, आज भी उनके आड़े आ जाती है। कांग्रेस पार्टी में महत्वाकांक्षा से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वह विनम्रता और दासता का चोला पहनकर सामने आए और इस ‘लॉयल्टी टेस्ट’ में मुखर्जी विफल माने जाते रहे हैं।
इसके बावजूद पिछले सात सालों में यूपीए की इस शीर्ष त्रयी ने अंदरूनी समीकरणों का यथासंभव समाधान किया है। यूपीए में जहां श्रीमती गांधी मातृशक्ति की तरह एकता की प्रतीक हैं, वहीं डॉ सिंह ईमानदार सीईओ और श्री मुखर्जी हमेशा तत्पर रहने वाले डिप्टी।
इन तीनों के प्रयासों से ही यूपीए की नैया अभी तक तैर रही है। श्रीमती गांधी की अस्वस्थता का यह अर्थ था कि वे कुछ समय तक पार्टी का ‘चेहरा’ होने की अपनी स्वाभाविक भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाएंगी।
घोटालों की श्रंखला ने ईमानदारी के इंडेक्स पर प्रधानमंत्री के एकाधिकार को कमजोर कर दिया और कैबिनेट में उभरे असहमति के सुरों ने संकट की स्थिति का सामना करने में श्री मुखर्जी की क्षमता को भी प्रश्नांकित किया।
उदाहरण के तौर पर पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्यों उन्हें एक ‘प्रतिनिधिमंडल’ के मुखिया के रूप में बाबा रामदेव की अगवानी करने भेजा गया? और क्यों २जी विवाद में उन्हें प्रेस बयान देने के लिए लगभग विवश किया गया, जबकि कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने कहा था कि मामला अभी विचाराधीन है?
समस्या का एक कारण शायद मंत्रिपद के व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों और ‘सामूहिक’ कैबिनेट उत्तरदायित्वों के बीच की रेखा का धुंधला जाना भी है। निर्णय प्रक्रिया में मनमानी और अहंकार भी देखा गया है। अन्ना हजारे की गिरफ्तारी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान सरकार से हुई गलतियां इसका एक अच्छा उदाहरण है।
आज भी हम यह नहीं जानते कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने का अंतिम निर्णय किसने लिया था और क्या उसमें सभी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों की सहमति थी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी को जरूर अन्ना पर अंगुली उठाने के लिए सॉफ्ट टारगेट बनाया गया हो, लेकिन यह विश्वास करना कठिन है कि वे अपने विवेक से ही बोल रहे थे।
इसी तरह 2जी मामले में यह मान लेना भी बेतुका होगा कि राजा कैबिनेट मंत्रियों और प्रधानमंत्री की उपेक्षा कर मनमर्जी से काम कर रहे थे। वास्तव में श्री मुखर्जी के प्रति सहानुभूति का अनुभव होता है। वे कई मायनों में पुरानी शैली के उन नेताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके लिए राजनीति एक फुलटाइम काम है।
यह यूपीए नेतृत्व की दयनीय स्थिति ही है कि राजनीतिक उत्तरदायित्व से अन्य व्यक्तियों द्वारा दूरी बनाए रखने का खामियाजा बार-बार उन्हें भुगतना पड़ा है।
लेकिन इन दोनों के साथ ही यूपीए में एक तीसरा सत्ता केंद्र भी था। भले ही यह तीसरा कोण बहुत जाहिर न रहा हो, लेकिन उसके महत्व से कभी इनकार नहीं किया जा सकता था। यूपीए में प्रणब मुखर्जी की भूमिका हमेशा एक वरिष्ठ मंत्री से अधिक रही है।
वास्तव में वे यूपीए के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) हैं और यह उनकी जिम्मेदारी रही है कि गठबंधन की राजनीति के समक्ष मुंह बाए खड़ी चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए। पिछले सात सालों से श्री मुखर्जी यूपीए द्वारा लिए जाने वाले लगभग हर राजनीतिक निर्णय या महत्वपूर्ण नीति के लिए ‘गो टु पर्सन’ रहे हैं।
विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक मसलों का हल करने के लिए बनाए गए 32 मंत्रियों के समूह के वे अध्यक्ष थे। अब मंत्रियों की संख्या 32 से घटकर 10 तक पहुंच गई है, लेकिन इससे यूपीए में श्री मुखर्जी की भूमिका और महत्व कम नहीं हो जाते।
यूपीए में संकट की किसी भी घड़ी में 13 तालकटोरा रोड स्थित मुखर्जी का निवास केंद्र बिंदु बन जाता है, जबकि इसकी तुलना में 7 रेसकोर्स रोड कभी-कभी परिधि पर ही बना रहता है। इससे यूपीए सिस्टम की सीमाएं ही उजागर होती हैं कि एक व्यक्ति से यह अपेक्षाएं की जा रही हैं कि वे तेलंगाना से लेकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर समस्या का समाधान करेंगे।
यह एक ऐसे सिस्टम की सीमाएं हैं, जिसके प्रधानमंत्री ने कभी कोई लोकप्रिय चुनाव नहीं जीता और जिसकी अध्यक्षा रोजमर्रा की राजनीति की कठोरताओं से दूरी बनाए रखना पसंद करती हैं। शायद, यह व्यवस्था यूपीए के दोनों शीर्ष व्यक्तियों के अनुरूप है।
एक उत्कृष्ट प्रशासनिक अधिकारी के रूप में डॉ सिंह कभी भी गठबंधन की राजनीति की रस्साकशी को लेकर सहज नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री की शैली कुछ इस तरह की है कि वे राजनीतिक निर्णयों के लिए सीधे जिम्मेदारी लेने से बचना पसंद करते हैं।
यहां भारत-अमेरिका एटमी डील एक महत्वपूर्ण अपवाद है। डॉ सिंह के लिए एक वांछित विकल्प यह रहा है कि उनके स्थान पर मंत्रियों के एक समूह द्वारा निर्णय लिया जाए। श्रीमती गांधी ने भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के जरिये ही राजनीतिक तंत्र में हस्तक्षेप करना पसंद किया है।
यह परिषद ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिन्हें किन्हीं मतदाताओं की चिंता करने की जरूरत नहीं है, लेकिन जिनके पास ये अधिकार और स्वतंत्रता है कि वे सरकार के निर्णयों को प्रभावित कर पाएं।
ऐसी स्थिति में श्री मुखर्जी यूपीए के सबसे बड़े संकटमोचक बनकर तो उभरे, लेकिन इसके साथ ही उनसे एक ‘लक्ष्मणरेखा’ के भीतर रहने की अपेक्षा भी की जाती रही। वह रेखा, जो यूपीए के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा तय की गई है।
उदाहरण के तौर पर वे प्रधानमंत्री बनने की कामना नहीं कर सकते। यूपीए नेतृत्व प्रथम परिवार के प्रति वफादारी की बुनियाद पर ही संचालित होता है और किन्हीं कारणों से 10 जनपथ हमेशा से श्री मुखर्जी के प्रति सतर्क ही रहा है।
संभवत: यह इतिहास का बोझ है। वह कहानी, जो कभी पूरी तरह सत्यापित नहीं हो सकी, कि किस तरह उन्होंने 1984 में इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी बनने का प्रयास किया था, आज भी उनके आड़े आ जाती है। कांग्रेस पार्टी में महत्वाकांक्षा से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वह विनम्रता और दासता का चोला पहनकर सामने आए और इस ‘लॉयल्टी टेस्ट’ में मुखर्जी विफल माने जाते रहे हैं।
इसके बावजूद पिछले सात सालों में यूपीए की इस शीर्ष त्रयी ने अंदरूनी समीकरणों का यथासंभव समाधान किया है। यूपीए में जहां श्रीमती गांधी मातृशक्ति की तरह एकता की प्रतीक हैं, वहीं डॉ सिंह ईमानदार सीईओ और श्री मुखर्जी हमेशा तत्पर रहने वाले डिप्टी।
इन तीनों के प्रयासों से ही यूपीए की नैया अभी तक तैर रही है। श्रीमती गांधी की अस्वस्थता का यह अर्थ था कि वे कुछ समय तक पार्टी का ‘चेहरा’ होने की अपनी स्वाभाविक भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाएंगी।
घोटालों की श्रंखला ने ईमानदारी के इंडेक्स पर प्रधानमंत्री के एकाधिकार को कमजोर कर दिया और कैबिनेट में उभरे असहमति के सुरों ने संकट की स्थिति का सामना करने में श्री मुखर्जी की क्षमता को भी प्रश्नांकित किया।
उदाहरण के तौर पर पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्यों उन्हें एक ‘प्रतिनिधिमंडल’ के मुखिया के रूप में बाबा रामदेव की अगवानी करने भेजा गया? और क्यों २जी विवाद में उन्हें प्रेस बयान देने के लिए लगभग विवश किया गया, जबकि कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने कहा था कि मामला अभी विचाराधीन है?
समस्या का एक कारण शायद मंत्रिपद के व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों और ‘सामूहिक’ कैबिनेट उत्तरदायित्वों के बीच की रेखा का धुंधला जाना भी है। निर्णय प्रक्रिया में मनमानी और अहंकार भी देखा गया है। अन्ना हजारे की गिरफ्तारी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान सरकार से हुई गलतियां इसका एक अच्छा उदाहरण है।
आज भी हम यह नहीं जानते कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने का अंतिम निर्णय किसने लिया था और क्या उसमें सभी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों की सहमति थी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी को जरूर अन्ना पर अंगुली उठाने के लिए सॉफ्ट टारगेट बनाया गया हो, लेकिन यह विश्वास करना कठिन है कि वे अपने विवेक से ही बोल रहे थे।
इसी तरह 2जी मामले में यह मान लेना भी बेतुका होगा कि राजा कैबिनेट मंत्रियों और प्रधानमंत्री की उपेक्षा कर मनमर्जी से काम कर रहे थे। वास्तव में श्री मुखर्जी के प्रति सहानुभूति का अनुभव होता है। वे कई मायनों में पुरानी शैली के उन नेताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके लिए राजनीति एक फुलटाइम काम है।
यह यूपीए नेतृत्व की दयनीय स्थिति ही है कि राजनीतिक उत्तरदायित्व से अन्य व्यक्तियों द्वारा दूरी बनाए रखने का खामियाजा बार-बार उन्हें भुगतना पड़ा है।
कांग्रेस को अच्छे चेहरे की जरूरत एम.जे. अकबर
ऑल इंडिया रेडियो को बिना शर्त, पूरी-पूरी बधाई। सरकार का यह आधिकारिक प्रसारणकर्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से मिली आधिकारिक सूचना से बेवकूफ नहीं बना, भले ही उस सूचना को पार्टी में प्रचलित तमाम उद्देश्यों के लिए अधिकृत जनार्दन द्विवेदी ने निजी तौर पर पढ़ा था।
द्विवेदी ने श्रीमती सोनिया गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण अनुपस्थिति में कांग्रेसी मामलों को देखने के लिए अधिकृत चार लोगों के समूह में एके एंटनी को शीर्ष पर रखा था, जबकि राहुल गांधी या तो नंबर दो पर थे या तीन पर- यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके संस्करण पर विचार कर रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो में ऐसी कोई नासमझी नहीं थी। इसने अपने सभी बुलेटिनों में राहुल गांधी के शीर्ष पर होने पर ही जोर दिया। रेडियो सही है।
अपने सभी गुणों के लिए, जिनमें बिना पलक झपकाए वफादारी निभाना सबसे महत्वपूर्ण है, एंटनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी नामांकित नहीं हुए हैं। राहुल गांधी हैं। अनिश्चितता इसके समय को लेकर है, न कि हां या नहीं को लेकर। यह धारणा लगातार बनी हुई है कि शायद राहुल गांधी अपनी विरासत को संभालने के लिए एकदम से तैयार नहीं हैं। खासतौर से, जब 2012 के राजनीतिक सीजन में भारी उथल-पुथल के आसार हैं, इसे लेकर जितने मुंह उतनी ही बातें हैं।
उनके सबसे जोशीले समर्थक मानते हैं कि अगर 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो संदेह के सारे बादल छंट जाएंगे। लेकिन इससे एक और प्रश्न उभरता है: ‘अच्छे’ की परिभाषा क्या है? संभवत: सूची में एक साफ संदेश है। अगर परिवर्तन की प्रक्रिया में किसी अंतरिम भूमिका की संभावना बनती है, तो फिर यह भूमिका एंटनी द्वारा निभाई जाएगी, न तो बहुत सक्षम प्रणव मुखर्जी द्वारा, न हमेशा के अभिलाषी या पीसी चिदंबरम द्वारा। छलांग लगाती महत्वाकांक्षाओं पर बहुत ठंडा पानी फिर गया है।
शायद हमें इस बारे में पहला संकेत मिल चुका है कि अगले साल राष्ट्रपति भवन के लिए कांग्रेस उम्मीदवार कौन हो सकता है। 2011 प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने का वर्ष रहा है। श्रीमती शीला दीक्षित, जो एक आदर्श राष्ट्रपति रही होतीं, उन पर कॉमनवेल्थ गेम्स मामले में आई सीएजी रिपोर्ट के जरिए कीचड़ उछला है। और प्रधानमंत्री कार्यालय के चारों तरफ भी जलस्तर बढ़ रहा है।
लेकिन एंटनी की छवि उनकी पारंपरिक केरलाई लुंगी की तरह झक सफेद बनी हुई है। न ही वे भरोसे की कमी से पीड़ित हैं, जो प्रणव मुखर्जी को हर बार सताती है, जब-जब प्रमोशन की बात आती है। बेशक, जब भी कड़ी मेहनत की जानी होती है, तो प्रणव मुखर्जी पर पूरा भरोसा किया जाता है।
2012 कांग्रेस की संभावनाओं के लिए बेहद निर्णायक है, जो इस साल मृतक-संसार में फिसल गई है। यह अच्छा होने के लिए इसका आखिरी मौका है। इसके लिए खुशकिस्मती की बात है कि इसका कोई भी गठबंधन सहयोगी सरकार की अस्थिरता से फायदा उठाने की हालत में नहीं है, वरना तत्काल कोई चुनाव कांग्रेस के लिए विनाशक हो सकता है। लेकिन चंगा होने के लिए सबसे पहले जरूरी है नेतृत्व और दिशा को लेकर स्पष्टता।
श्रीमती सोनिया गांधी की अचानक आई बीमारी राहुल गांधी के लिए प्रगति की दोहरी छलांग का राजनीतिक मौका बन सकती है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पहली छलांग और फिर डॉ. मनमोहन सिंह की कुर्सी पर। यहां यह दर्ज होना चाहिए कि प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी को नियमित तौर पर न्योता भेजते ही रहे हैं, इसलिए इस बदलाव से दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह राहुल गांधी को अपने आप को दिखाने का दो साल का मौका देगा, जबकि देश को उनकी क्षमताओं को समझने का अवसर मिलेगा। उन्होंने सत्ता से एक सुविचारित दूरी बनाए रखी है, लेकिन यह तो मुकरना हुआ।
किसी समस्या के समाधान के तौर पर कभी कोई समूह गठित नहीं होता। यह तो समाधान मिलने तक महज एक पुल होता है। कांग्रेस के लिए बदतर संभावना यह हो सकती है कि समिति की ओर मुड़ना पड़े। श्रीमती सोनिया गांधी जानती हैं कि पार्टी के सामने खड़ी चुनौतियां उनकी वापसी के वक्त तक बढ़ने ही वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिक्कतों के पिटारे को खोल दिया है, जिससे प्रतिष्ठान ने बड़ी चतुराई से सील कर दिया था।
कोर्ट ने पुलिस को वोट के लिए नोट कांड में कार्रवाई के लिए कहा है, जिसने 2008 में परमाणु समझौते के दौरान हुए मतदान में सरकार को बचाया था। कोई जानकारी नहीं कि प्रसुप्त पुलिस द्वारा कब यह कार्रवाई की जाएगी। पिटारे में अभी भी आग बाकी है, जो सरकार में किसी को भी जला सकती है। और कांग्रेस फायर ब्रिगेड के पास सीमित उपकरण बचे हैं। यदि बहुत सारे चेहरे झुलसकर काले पड़ जाते हैं, तो कांग्रेस को एक नए चेहरे की जरूरत होगी।
अगर राहुल तैयार ही नहीं होते हैं, तो यह चेहरा एंटनी हो सकते हैं। लेकिन आपके लिए राहुल गांधी पर दांव लगाना ज्यादा बुद्धिमानी का काम होगा। ऐसी अभूतपूर्व हलचल के बीच अच्छी खबर यह है कि सीएजी जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं और इसके प्रशंसनीय मुखिया विनोद राय राजनीतिक वर्ग रूपी ऊंट को पहाड़ के नीचे ले आए हैं। जो भारत के भ्रष्टाचार को लेकर हंसते हैं, उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सराहना के लिए कुछ पल तो निकालने ही चाहिए।
भारत में चीन की तरह तानाशाही नहीं है, जिसने वेंशोउ में हुई ट्रेन दुर्घटना में सरकारी लापरवाही को लेकर होने वाली रिपोर्टिग पर सेंसर लगा दिया। और फिर जांच समिति में रेलवे मंत्रालय के दूसरे नंबर के महत्वपूर्ण व्यक्ति को रख दिया। भारत में अभियुक्त ही न्यायाधीश नहीं होता। देश, सरकार से बड़ा है।
द्विवेदी ने श्रीमती सोनिया गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण अनुपस्थिति में कांग्रेसी मामलों को देखने के लिए अधिकृत चार लोगों के समूह में एके एंटनी को शीर्ष पर रखा था, जबकि राहुल गांधी या तो नंबर दो पर थे या तीन पर- यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके संस्करण पर विचार कर रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो में ऐसी कोई नासमझी नहीं थी। इसने अपने सभी बुलेटिनों में राहुल गांधी के शीर्ष पर होने पर ही जोर दिया। रेडियो सही है।
अपने सभी गुणों के लिए, जिनमें बिना पलक झपकाए वफादारी निभाना सबसे महत्वपूर्ण है, एंटनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी नामांकित नहीं हुए हैं। राहुल गांधी हैं। अनिश्चितता इसके समय को लेकर है, न कि हां या नहीं को लेकर। यह धारणा लगातार बनी हुई है कि शायद राहुल गांधी अपनी विरासत को संभालने के लिए एकदम से तैयार नहीं हैं। खासतौर से, जब 2012 के राजनीतिक सीजन में भारी उथल-पुथल के आसार हैं, इसे लेकर जितने मुंह उतनी ही बातें हैं।
उनके सबसे जोशीले समर्थक मानते हैं कि अगर 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो संदेह के सारे बादल छंट जाएंगे। लेकिन इससे एक और प्रश्न उभरता है: ‘अच्छे’ की परिभाषा क्या है? संभवत: सूची में एक साफ संदेश है। अगर परिवर्तन की प्रक्रिया में किसी अंतरिम भूमिका की संभावना बनती है, तो फिर यह भूमिका एंटनी द्वारा निभाई जाएगी, न तो बहुत सक्षम प्रणव मुखर्जी द्वारा, न हमेशा के अभिलाषी या पीसी चिदंबरम द्वारा। छलांग लगाती महत्वाकांक्षाओं पर बहुत ठंडा पानी फिर गया है।
शायद हमें इस बारे में पहला संकेत मिल चुका है कि अगले साल राष्ट्रपति भवन के लिए कांग्रेस उम्मीदवार कौन हो सकता है। 2011 प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने का वर्ष रहा है। श्रीमती शीला दीक्षित, जो एक आदर्श राष्ट्रपति रही होतीं, उन पर कॉमनवेल्थ गेम्स मामले में आई सीएजी रिपोर्ट के जरिए कीचड़ उछला है। और प्रधानमंत्री कार्यालय के चारों तरफ भी जलस्तर बढ़ रहा है।
लेकिन एंटनी की छवि उनकी पारंपरिक केरलाई लुंगी की तरह झक सफेद बनी हुई है। न ही वे भरोसे की कमी से पीड़ित हैं, जो प्रणव मुखर्जी को हर बार सताती है, जब-जब प्रमोशन की बात आती है। बेशक, जब भी कड़ी मेहनत की जानी होती है, तो प्रणव मुखर्जी पर पूरा भरोसा किया जाता है।
2012 कांग्रेस की संभावनाओं के लिए बेहद निर्णायक है, जो इस साल मृतक-संसार में फिसल गई है। यह अच्छा होने के लिए इसका आखिरी मौका है। इसके लिए खुशकिस्मती की बात है कि इसका कोई भी गठबंधन सहयोगी सरकार की अस्थिरता से फायदा उठाने की हालत में नहीं है, वरना तत्काल कोई चुनाव कांग्रेस के लिए विनाशक हो सकता है। लेकिन चंगा होने के लिए सबसे पहले जरूरी है नेतृत्व और दिशा को लेकर स्पष्टता।
श्रीमती सोनिया गांधी की अचानक आई बीमारी राहुल गांधी के लिए प्रगति की दोहरी छलांग का राजनीतिक मौका बन सकती है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पहली छलांग और फिर डॉ. मनमोहन सिंह की कुर्सी पर। यहां यह दर्ज होना चाहिए कि प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी को नियमित तौर पर न्योता भेजते ही रहे हैं, इसलिए इस बदलाव से दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह राहुल गांधी को अपने आप को दिखाने का दो साल का मौका देगा, जबकि देश को उनकी क्षमताओं को समझने का अवसर मिलेगा। उन्होंने सत्ता से एक सुविचारित दूरी बनाए रखी है, लेकिन यह तो मुकरना हुआ।
किसी समस्या के समाधान के तौर पर कभी कोई समूह गठित नहीं होता। यह तो समाधान मिलने तक महज एक पुल होता है। कांग्रेस के लिए बदतर संभावना यह हो सकती है कि समिति की ओर मुड़ना पड़े। श्रीमती सोनिया गांधी जानती हैं कि पार्टी के सामने खड़ी चुनौतियां उनकी वापसी के वक्त तक बढ़ने ही वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिक्कतों के पिटारे को खोल दिया है, जिससे प्रतिष्ठान ने बड़ी चतुराई से सील कर दिया था।
कोर्ट ने पुलिस को वोट के लिए नोट कांड में कार्रवाई के लिए कहा है, जिसने 2008 में परमाणु समझौते के दौरान हुए मतदान में सरकार को बचाया था। कोई जानकारी नहीं कि प्रसुप्त पुलिस द्वारा कब यह कार्रवाई की जाएगी। पिटारे में अभी भी आग बाकी है, जो सरकार में किसी को भी जला सकती है। और कांग्रेस फायर ब्रिगेड के पास सीमित उपकरण बचे हैं। यदि बहुत सारे चेहरे झुलसकर काले पड़ जाते हैं, तो कांग्रेस को एक नए चेहरे की जरूरत होगी।
अगर राहुल तैयार ही नहीं होते हैं, तो यह चेहरा एंटनी हो सकते हैं। लेकिन आपके लिए राहुल गांधी पर दांव लगाना ज्यादा बुद्धिमानी का काम होगा। ऐसी अभूतपूर्व हलचल के बीच अच्छी खबर यह है कि सीएजी जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं और इसके प्रशंसनीय मुखिया विनोद राय राजनीतिक वर्ग रूपी ऊंट को पहाड़ के नीचे ले आए हैं। जो भारत के भ्रष्टाचार को लेकर हंसते हैं, उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सराहना के लिए कुछ पल तो निकालने ही चाहिए।
भारत में चीन की तरह तानाशाही नहीं है, जिसने वेंशोउ में हुई ट्रेन दुर्घटना में सरकारी लापरवाही को लेकर होने वाली रिपोर्टिग पर सेंसर लगा दिया। और फिर जांच समिति में रेलवे मंत्रालय के दूसरे नंबर के महत्वपूर्ण व्यक्ति को रख दिया। भारत में अभियुक्त ही न्यायाधीश नहीं होता। देश, सरकार से बड़ा है।
रॉयल बंगाल टाइगर थे नवाब पटौदी -एम.जे. अकबर
मेरे जन्मस्थान, एक छोटे शहर के अकेलेपन और बोर्डिंग स्कूल के बंद कपाटों वाले बरसों में स्वप्न अंग्रेजी के पांच अक्षरों वाला एक शब्द हुआ करता था- टाइगर। जब जोशीली हरी आंख के साथ रेडियो टेस्ट क्रिकेट के लिए हमारा बुनियादी प्रवेशपत्र होता था, उन दिनों मंसूर अली खान पटौदी का जादू क्रिकेट कमेंट्री के लिए पारित गप्पबाजी पर छाया होता था।
द्वितीयक ज्ञान मिलता था श्वेत-श्याम अखबारों की धूसर तस्वीरों से। रेडियो यादों में चला गया। नील हार्वे, रिकी बेनॉड, वेस हॉल, गारफील्ड सोबर्स और फ्रेंक वोरेल जैसे साथियों के साथ फोटोग्राफ बड़े लगाव से स्क्रैपबुक में संरक्षित कर लिया गया। मैंने वोरेल को इस लब्धप्रतिष्ठित कंपनी में इसलिए नहीं रखा है कि वे बल्लेबाजी कर सकते थे, बल्कि इसलिए कि वे नेतृत्व कर सकते थे।
1960 के दशक तक ‘नवाब’ की पदवी एक कमजोर हास्यचित्र में बदल चुकी थी, 18वीं सदी के चमकदार दिनों का एक दीन-हीन वंशज- पहले अंग्रेजों के पिनपिने चापलूस के तौर पर अवनत हुआ और फिर आजादी बाद के नेताओं के अहंकारी पिछलग्गू के रूप में।
यहां तक कि हिंदी सिनेमा ने भी ‘छोटे नवाब’पर हंसना शुरू कर दिया, जब तक कि यह शोकग्रस्त आत्मदया में नहीं धकेल दिया गया, जैसे कि ‘मेरे महबूब’ में नवाब साहब अपने बचे-खुचे बेहद निर्थक सम्मान की रक्षा के लिए अपने कीमती माल-असबाब की नीलामी करते हैं।
फिर इंदिरा गांधी का आगमन हुआ। 1969 में उन्होंने नवाबों और राजाओं को अवैध घोषित कर दिया। इन नवाबों और राजाओं का प्रचंड रोष उनकी असमर्थता की तरह ही बचकाना था। जब उन्होंने 1971 के आम चुनावों में श्रीमती गांधी को चुनौती देने की कोशिश की, तो उन्हें पता चला कि वे बदलते हुए भारत से कितनी दूर हो गए हैं।
श्रीमती गांधी को सत्ता तक पहुंचाकर इस चुनाव ने एक नया अनुक्रम अभिषिक्त किया। भारत की नई रानी इंदिरा गांधी थीं, लोकतंत्र की बेगम। टाइगर अपने किसी भी अन्य भाई-बंधु जैसे ही परेशान थे, पर उन्होंने किसी भी तरह के व्यक्तिगत सदमे को बहुत बारीकी से तराशे हुए हास्यबोध के पीछे छुपा लिया।
इस हास्यबोध में व्यावहारिक लतीफों के जबरदस्त मजाक के घालमेल के साथ ही एक भावहीन ब्रिटिश मुखौटा भी था। वे एक आदर्श इंडो-एंग्लियन थे। स्कॉटिश जंगलों में शिकारी की जैकेट में भी उतने ही सहज, जितने कि शानदार शेरवानी में।
उनके नटखट मजाकों के लिए रणनीति अक्सर खुशगवार बार के पार गजब की होती थी और लंबे समय बाद, जब तक कि शिकार झांसे में न आ जाए, तब तक रहस्य को बड़ी सतर्कता से बचाकर रखा जाता था। बेशक यह धोखा बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं होता था।
यह बड़ा त्रासद है कि उनके जीवन का आखिरी प्रसंग एमसीसी की ओर से अनदेखी थी, जिसने इन गर्मियों में भारत-इंग्लैंड सीरीज के बाद पारंपरिक पटौदी ट्रॉफी वितरित करने से इंकार कर दिया था। भारतीय राजकुमार एक रेशमी बंधन के जरिए इंग्लिश क्रिकेट के लिए बाध्य थे।
एक स्तर पर, इसने उन्हें नए शासक वर्ग के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों में रखा, जैसा कि मुगल काल में शिकार ने किया था। इसके साथ ही यह शाही प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए एक उपयुक्त थिएटर के रूप में भी सामने आया।
इसने न तो अंग्रेजों को आशंकित किया और न ही बहुत गौण महत्व वाले भारतीयों को सम्मिलित किया। एक नवाब के लिए बहुत ज्यादा सफल बिजनेस एक्जीक्यूटिव बनना भी प्रतिष्ठा के खिलाफ रहा होता- यहां तक कि कोई प्रतिष्ठित कंपनी भी भारतीय कुलीन की प्रतिष्ठा के लिए नाकाफी थी।
सेना एक सम्माजनक अभयारण्य था, लेकिन बहुत कम पारितोषिक के लिए बहुत ज्यादा अनुशासन की दरकार थी। राजनीति भी एक विकल्प थी, लेकिन उसमें जनसाधारण के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होता है।
ग्लैमर के साथ टाइगर का एक न्यायसंगत नाता था। वे पाखंडी नहीं थे, इसलिए उन्होंने ग्लैमर का कभी तिरस्कार नहीं किया। लेकिन वे कभी आत्ममुग्ध भी नहीं हुए। रनों की कमी के कई कारण गिनाए गए हैं: उन्होंने सिर्फ छह शतक लगाए।
लोकप्रिय सिद्धांत यह है कि जब वे ऑक्सफोर्ड में थे, तभी एक त्रासद कार दुर्घटना में उन्हें एक आंख गंवानी पड़ी। मुझमें यह मानने की प्रवृत्ति है कि उन्हें कोई परेशानी नहीं रही होगी। क्रिकेट एक खेल था, न कि मजहब। उन्होंने आंकड़ों की वेदी पर खेल के आनंद की बलि नहीं दी।
पटौदी अपनी आकर्षक स्टाइल और क्रीज पर धीर-गंभीर बर्ताव के कारण माने हुए टाइगर बने। उनकी शांति तब तक रहती थी, जब तक कि सहज झपट्टे का वक्त नहीं आ जाता था। उन्होंने टाइगर की मुस्कान भी धारण की, एक कंपन, जो कभी-कभार ही चेहरे पर बुलबुले की तरह उभरता है।
इस टाइगर को विशेष दर्जा मिला था: रॉयल बंगाल, एक विशेषण जिसे कोलकाता ने खुशी-खुशी स्वीकार किया, जब उन्होंने महान टैगोर परिवार की प्रतिभाशाली पुत्री शर्मिला से विवाह किया।
मैं हैरान हूं कि टाइगर के निधन के बाद जैसी बनावटी बोलियां उभरी हैं, उन पर खुद टाइगर ने कैसी प्रतिक्रिया दी होती। कंधों को सिकोड़ना, सिर डुलाना या ऊब की आधी मुस्कान। उन्हें रूढ़ उक्तियों से नफरत थी, इसलिए क्या मेहरबानी करके हम ‘क्रिकेट और निर्धन हो गया’ जैसी बकवास का त्याग कर सकते हैं?
टाइगर ने पिछली दफा जब बल्ला थामा था, उसके बाद से क्रिकेट नकदी और तकनीक, दोनों मामलों में असीमित रूप से समृद्ध हुआ है। लेकिन उनके निधन के बाद दुनिया निश्चित तौर पर निर्धन हुई है।
द्वितीयक ज्ञान मिलता था श्वेत-श्याम अखबारों की धूसर तस्वीरों से। रेडियो यादों में चला गया। नील हार्वे, रिकी बेनॉड, वेस हॉल, गारफील्ड सोबर्स और फ्रेंक वोरेल जैसे साथियों के साथ फोटोग्राफ बड़े लगाव से स्क्रैपबुक में संरक्षित कर लिया गया। मैंने वोरेल को इस लब्धप्रतिष्ठित कंपनी में इसलिए नहीं रखा है कि वे बल्लेबाजी कर सकते थे, बल्कि इसलिए कि वे नेतृत्व कर सकते थे।
1960 के दशक तक ‘नवाब’ की पदवी एक कमजोर हास्यचित्र में बदल चुकी थी, 18वीं सदी के चमकदार दिनों का एक दीन-हीन वंशज- पहले अंग्रेजों के पिनपिने चापलूस के तौर पर अवनत हुआ और फिर आजादी बाद के नेताओं के अहंकारी पिछलग्गू के रूप में।
यहां तक कि हिंदी सिनेमा ने भी ‘छोटे नवाब’पर हंसना शुरू कर दिया, जब तक कि यह शोकग्रस्त आत्मदया में नहीं धकेल दिया गया, जैसे कि ‘मेरे महबूब’ में नवाब साहब अपने बचे-खुचे बेहद निर्थक सम्मान की रक्षा के लिए अपने कीमती माल-असबाब की नीलामी करते हैं।
फिर इंदिरा गांधी का आगमन हुआ। 1969 में उन्होंने नवाबों और राजाओं को अवैध घोषित कर दिया। इन नवाबों और राजाओं का प्रचंड रोष उनकी असमर्थता की तरह ही बचकाना था। जब उन्होंने 1971 के आम चुनावों में श्रीमती गांधी को चुनौती देने की कोशिश की, तो उन्हें पता चला कि वे बदलते हुए भारत से कितनी दूर हो गए हैं।
श्रीमती गांधी को सत्ता तक पहुंचाकर इस चुनाव ने एक नया अनुक्रम अभिषिक्त किया। भारत की नई रानी इंदिरा गांधी थीं, लोकतंत्र की बेगम। टाइगर अपने किसी भी अन्य भाई-बंधु जैसे ही परेशान थे, पर उन्होंने किसी भी तरह के व्यक्तिगत सदमे को बहुत बारीकी से तराशे हुए हास्यबोध के पीछे छुपा लिया।
इस हास्यबोध में व्यावहारिक लतीफों के जबरदस्त मजाक के घालमेल के साथ ही एक भावहीन ब्रिटिश मुखौटा भी था। वे एक आदर्श इंडो-एंग्लियन थे। स्कॉटिश जंगलों में शिकारी की जैकेट में भी उतने ही सहज, जितने कि शानदार शेरवानी में।
उनके नटखट मजाकों के लिए रणनीति अक्सर खुशगवार बार के पार गजब की होती थी और लंबे समय बाद, जब तक कि शिकार झांसे में न आ जाए, तब तक रहस्य को बड़ी सतर्कता से बचाकर रखा जाता था। बेशक यह धोखा बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं होता था।
यह बड़ा त्रासद है कि उनके जीवन का आखिरी प्रसंग एमसीसी की ओर से अनदेखी थी, जिसने इन गर्मियों में भारत-इंग्लैंड सीरीज के बाद पारंपरिक पटौदी ट्रॉफी वितरित करने से इंकार कर दिया था। भारतीय राजकुमार एक रेशमी बंधन के जरिए इंग्लिश क्रिकेट के लिए बाध्य थे।
एक स्तर पर, इसने उन्हें नए शासक वर्ग के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों में रखा, जैसा कि मुगल काल में शिकार ने किया था। इसके साथ ही यह शाही प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए एक उपयुक्त थिएटर के रूप में भी सामने आया।
इसने न तो अंग्रेजों को आशंकित किया और न ही बहुत गौण महत्व वाले भारतीयों को सम्मिलित किया। एक नवाब के लिए बहुत ज्यादा सफल बिजनेस एक्जीक्यूटिव बनना भी प्रतिष्ठा के खिलाफ रहा होता- यहां तक कि कोई प्रतिष्ठित कंपनी भी भारतीय कुलीन की प्रतिष्ठा के लिए नाकाफी थी।
सेना एक सम्माजनक अभयारण्य था, लेकिन बहुत कम पारितोषिक के लिए बहुत ज्यादा अनुशासन की दरकार थी। राजनीति भी एक विकल्प थी, लेकिन उसमें जनसाधारण के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होता है।
ग्लैमर के साथ टाइगर का एक न्यायसंगत नाता था। वे पाखंडी नहीं थे, इसलिए उन्होंने ग्लैमर का कभी तिरस्कार नहीं किया। लेकिन वे कभी आत्ममुग्ध भी नहीं हुए। रनों की कमी के कई कारण गिनाए गए हैं: उन्होंने सिर्फ छह शतक लगाए।
लोकप्रिय सिद्धांत यह है कि जब वे ऑक्सफोर्ड में थे, तभी एक त्रासद कार दुर्घटना में उन्हें एक आंख गंवानी पड़ी। मुझमें यह मानने की प्रवृत्ति है कि उन्हें कोई परेशानी नहीं रही होगी। क्रिकेट एक खेल था, न कि मजहब। उन्होंने आंकड़ों की वेदी पर खेल के आनंद की बलि नहीं दी।
पटौदी अपनी आकर्षक स्टाइल और क्रीज पर धीर-गंभीर बर्ताव के कारण माने हुए टाइगर बने। उनकी शांति तब तक रहती थी, जब तक कि सहज झपट्टे का वक्त नहीं आ जाता था। उन्होंने टाइगर की मुस्कान भी धारण की, एक कंपन, जो कभी-कभार ही चेहरे पर बुलबुले की तरह उभरता है।
इस टाइगर को विशेष दर्जा मिला था: रॉयल बंगाल, एक विशेषण जिसे कोलकाता ने खुशी-खुशी स्वीकार किया, जब उन्होंने महान टैगोर परिवार की प्रतिभाशाली पुत्री शर्मिला से विवाह किया।
मैं हैरान हूं कि टाइगर के निधन के बाद जैसी बनावटी बोलियां उभरी हैं, उन पर खुद टाइगर ने कैसी प्रतिक्रिया दी होती। कंधों को सिकोड़ना, सिर डुलाना या ऊब की आधी मुस्कान। उन्हें रूढ़ उक्तियों से नफरत थी, इसलिए क्या मेहरबानी करके हम ‘क्रिकेट और निर्धन हो गया’ जैसी बकवास का त्याग कर सकते हैं?
टाइगर ने पिछली दफा जब बल्ला थामा था, उसके बाद से क्रिकेट नकदी और तकनीक, दोनों मामलों में असीमित रूप से समृद्ध हुआ है। लेकिन उनके निधन के बाद दुनिया निश्चित तौर पर निर्धन हुई है।
उपवासों के राजनीतिक संदेश - श्रवण गर्ग
नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए बहुचर्चित एवं बहुप्रचारित उपवास का राष्ट्र के नाम संदेश क्या रहा, इसका पता गुजरात सहित अन्य राज्यों में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही चल पाएगा और वह भी पूरी तरह नहीं।
नरेंद्र मोदी ने सद्भावना मिशन की शुरुआत का बीड़ा उस समय उठाया, जब गुजरात में लगभग हर मोर्चे पर सबसे ज्यादा शांति व सद्भाव कायम है। भारतीय जनता पार्टी इस बात पर गर्व कर सकती है कि कारण चाहे जो भी हों, उसकी झोली में पड़े राज्यों में कम से कम एक तो ऐसा है, जहां उसे मुख्यमंत्री बदलने अथवा मंत्रिमंडल की सूची को स्वीकृति देने या संसद के लिए उम्मीदवार तय करने में कभी कोई मेहनत नहीं करना पड़ी। इसे नरेंद्र मोदी की कार्यकुशलता भी माना जा सकता है या पार्टी आलाकमान पर मुख्यमंत्री का दबदबा भी।
पूछा जा सकता है कि सद्भावना मिशन अथवा अन्य किसी बहाने से नरेंद्र मोदी अगर देश की जनता से रू-ब-रू होकर अपनी असली ताकत दिखाने की इच्छा रखकर चल रहे थे तो उन्हें और कितनी प्रतीक्षा करनी चाहिए थी? वह कौन-सा उचित तरीका और समय हो सकता था, जब वे एक राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी ही पार्टी और एनडीए के समक्ष प्रस्तुत होते?
अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली राहत के केवल दो दिन बाद ही अमेरिकी रिपोर्ट का मोदी के पक्ष में उजागर होना किसी भी समझदार मुख्यमंत्री के लिए उपवास और राजनीतिक कवरेज के लिए बेहतर अवसर माना जा सकता था।
राष्ट्रीय राजनीति की नब्ज टटोलने के अवसर को अगर मोदी ने पार्टी आलाकमान और संघ मुख्यालय की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बगैर ही लपक लिया तो इसकी उनके राजनीतिक कौशल के रूप में तारीफ की जा सकती है।
वर्ष 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच सीधा मुकाबला होता भी है या नहीं, यह अभी दूर की कौड़ी है। तब तक तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए विधानसभा चुनाव वाले राज्यों (खासकर उत्तर प्रदेश) की नदियों में काफी पानी बह चुका होगा।
भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार के रूप में अपनी स्थायी पहचान बनाए रखने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा प्रारंभ होने के पहले ही नरेंद्र मोदी द्वारा अपने उपवास के मार्फत की गई ‘राष्ट्रनीति’ की घोषणा कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
इस बात के अलावा कि नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी के सवाल ने एक सशक्त राजनीतिक विकल्प के रूप में एनडीए की संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न् लगा दिया है, भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिए भी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
मसलन, गुजरात के मुख्यमंत्री का यह मानना कि सेकुलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) ने पिछले साठ सालों में देश को बांटने का ही काम किया है अथवा उनका यह कथन कि वे बहुमत-अल्पमत के विचार और वोट बैंक की राजनीति में यकीन नहीं करते, संघ और भाजपा के लिए वैचारिक स्तर पर कई चुनौतियां खड़ी कर देगा। वृहत हिंदू समाज का वह सेकुलर वर्ग, जो धीरे-धीरे यह मानने को तैयार हो रहा था कि भाजपा अपने कट्टर हिंदूवादी एजेंडे को डायल्यूट कर अपने घोषणापत्र को नए सिरे से लिखने का काम कर रही है, फिर सशंकित हो जाएगा।
इसी तरह अल्पसंख्यक समुदायों का धर्मनिरपेक्ष तबका फिर से कट्टरपंथी ताकतों की ओर रुख करने लगेगा। राजेंद्र सच्चर कमेटी के साथ बैठक में नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया यह जवाब गुजरात के संदर्भ में सही हो सकता है कि मुख्यमंत्री ‘अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कुछ नहीं करते, पर साथ ही बहुसंख्यकों के लिए भी नहीं करते’, पर यह देश की मौजूदा हकीकत से मेल नहीं खाता।
राष्ट्रीय एकता परिषद की हाल में हुई बैठक में सांप्रदायिक हिंसा विधेयकके मसौदे पर चर्चा के दौरान समूची बहस ‘बहुमत’ की ‘अल्पमत’ के खिलाफ हिंसा और उसके लिए सजा के प्रावधानों के औचित्य पर ही केंद्रित रही। बहस में भाग लेने वालों में भाजपा के प्रमुख नेता भी शामिल थे।
विकास की अवधारणा के सिद्धांत तय करने के मामले में बहुमत-अल्पमत के बीच फर्क को खत्म किया जा सकता है, पर नौकरियां उपलब्ध कराने, सामाजिक न्याय बांटने और सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा देने के मामले में वास्तविकताएं राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडों से विपरीत हैं। भाजपा का नेतृत्व नरेंद्र मोदी को अपनी अग्रिम पंक्ति का नेता मानने से तो निश्चित ही इनकार नहीं करता है, पर जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया है, उन पर स्पष्टता का होना बाकी रहेगा।
बहस का एक मुद्दा यह भी बनता है कि नरेंद्र मोदी ने देश के प्रमुख विपक्षी दल (भाजपा) और विपक्षी गठबंधन (एनडीए) को लोकसभा चुनावों की तारीखों के काफी पहले ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बहस में व्यस्त कर दिया। कहा नहीं जा सकता कि भाजपा और संघ के अंदरूनी क्षेत्रों में ताजा बहस को लेकर क्या प्रतिक्रिया है, पर एनडीए के घटक दलों, विशेषकर जद-यू की ओर से जो कुछ कहा गया, वह ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है। जनता जानती है कि भावी प्रधानमंत्री को लेकर यूपीए में चाहे भ्रम की कोई स्थिति हो, गैर-यूपीए दलों में तो इस शीर्ष पद के लिए कई उम्मीदवार इस समय मौजूद हैं।
इन मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने-अपने राज्यों में उपवास पर बैठना ही बस शेष है। चर्चा यहां चूंकि नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए मिशन की हो रही है, लिहाजा उनकी दृष्टि से देखा जाए तो अन्ना के आंदोलन से उत्पन्न हुए माहौल का लाभ लेने के लिए एक रामलीला मैदान अहमदाबाद में भी खड़ा करना जरूरी हो गया था। अपना उपवास तोड़ते हुए नरेंद्र मोदी ने कटाक्ष किया था कि देश को बड़े ‘सपने’ देखने की आदत नहीं है।
‘राष्ट्र की सेवा’ के अपने ‘सपने’ को कोई रूप देने सेपहले नरेंद्र मोदी के लिए जरूरी था कि भाजपा व एनडीए में अपने नेतृत्व की संभावनाओं को सद्भावना मिशन के जरिए ठीक तरह से टटोल लें। इतिहास गवाह है कि कोई एक चौथाई सदी तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके ज्योति बसु के समक्ष जब प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का अवसर उत्पन्न हुआ तो उनकी ही पार्टी के कतिपय लोगों का विरोध आड़े आ गया था।
नरेंद्र मोदी ने सद्भावना मिशन की शुरुआत का बीड़ा उस समय उठाया, जब गुजरात में लगभग हर मोर्चे पर सबसे ज्यादा शांति व सद्भाव कायम है। भारतीय जनता पार्टी इस बात पर गर्व कर सकती है कि कारण चाहे जो भी हों, उसकी झोली में पड़े राज्यों में कम से कम एक तो ऐसा है, जहां उसे मुख्यमंत्री बदलने अथवा मंत्रिमंडल की सूची को स्वीकृति देने या संसद के लिए उम्मीदवार तय करने में कभी कोई मेहनत नहीं करना पड़ी। इसे नरेंद्र मोदी की कार्यकुशलता भी माना जा सकता है या पार्टी आलाकमान पर मुख्यमंत्री का दबदबा भी।
पूछा जा सकता है कि सद्भावना मिशन अथवा अन्य किसी बहाने से नरेंद्र मोदी अगर देश की जनता से रू-ब-रू होकर अपनी असली ताकत दिखाने की इच्छा रखकर चल रहे थे तो उन्हें और कितनी प्रतीक्षा करनी चाहिए थी? वह कौन-सा उचित तरीका और समय हो सकता था, जब वे एक राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी ही पार्टी और एनडीए के समक्ष प्रस्तुत होते?
अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली राहत के केवल दो दिन बाद ही अमेरिकी रिपोर्ट का मोदी के पक्ष में उजागर होना किसी भी समझदार मुख्यमंत्री के लिए उपवास और राजनीतिक कवरेज के लिए बेहतर अवसर माना जा सकता था।
राष्ट्रीय राजनीति की नब्ज टटोलने के अवसर को अगर मोदी ने पार्टी आलाकमान और संघ मुख्यालय की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बगैर ही लपक लिया तो इसकी उनके राजनीतिक कौशल के रूप में तारीफ की जा सकती है।
वर्ष 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच सीधा मुकाबला होता भी है या नहीं, यह अभी दूर की कौड़ी है। तब तक तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए विधानसभा चुनाव वाले राज्यों (खासकर उत्तर प्रदेश) की नदियों में काफी पानी बह चुका होगा।
भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार के रूप में अपनी स्थायी पहचान बनाए रखने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा प्रारंभ होने के पहले ही नरेंद्र मोदी द्वारा अपने उपवास के मार्फत की गई ‘राष्ट्रनीति’ की घोषणा कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
इस बात के अलावा कि नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी के सवाल ने एक सशक्त राजनीतिक विकल्प के रूप में एनडीए की संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न् लगा दिया है, भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिए भी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
मसलन, गुजरात के मुख्यमंत्री का यह मानना कि सेकुलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) ने पिछले साठ सालों में देश को बांटने का ही काम किया है अथवा उनका यह कथन कि वे बहुमत-अल्पमत के विचार और वोट बैंक की राजनीति में यकीन नहीं करते, संघ और भाजपा के लिए वैचारिक स्तर पर कई चुनौतियां खड़ी कर देगा। वृहत हिंदू समाज का वह सेकुलर वर्ग, जो धीरे-धीरे यह मानने को तैयार हो रहा था कि भाजपा अपने कट्टर हिंदूवादी एजेंडे को डायल्यूट कर अपने घोषणापत्र को नए सिरे से लिखने का काम कर रही है, फिर सशंकित हो जाएगा।
इसी तरह अल्पसंख्यक समुदायों का धर्मनिरपेक्ष तबका फिर से कट्टरपंथी ताकतों की ओर रुख करने लगेगा। राजेंद्र सच्चर कमेटी के साथ बैठक में नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया यह जवाब गुजरात के संदर्भ में सही हो सकता है कि मुख्यमंत्री ‘अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कुछ नहीं करते, पर साथ ही बहुसंख्यकों के लिए भी नहीं करते’, पर यह देश की मौजूदा हकीकत से मेल नहीं खाता।
राष्ट्रीय एकता परिषद की हाल में हुई बैठक में सांप्रदायिक हिंसा विधेयकके मसौदे पर चर्चा के दौरान समूची बहस ‘बहुमत’ की ‘अल्पमत’ के खिलाफ हिंसा और उसके लिए सजा के प्रावधानों के औचित्य पर ही केंद्रित रही। बहस में भाग लेने वालों में भाजपा के प्रमुख नेता भी शामिल थे।
विकास की अवधारणा के सिद्धांत तय करने के मामले में बहुमत-अल्पमत के बीच फर्क को खत्म किया जा सकता है, पर नौकरियां उपलब्ध कराने, सामाजिक न्याय बांटने और सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा देने के मामले में वास्तविकताएं राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडों से विपरीत हैं। भाजपा का नेतृत्व नरेंद्र मोदी को अपनी अग्रिम पंक्ति का नेता मानने से तो निश्चित ही इनकार नहीं करता है, पर जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया है, उन पर स्पष्टता का होना बाकी रहेगा।
बहस का एक मुद्दा यह भी बनता है कि नरेंद्र मोदी ने देश के प्रमुख विपक्षी दल (भाजपा) और विपक्षी गठबंधन (एनडीए) को लोकसभा चुनावों की तारीखों के काफी पहले ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बहस में व्यस्त कर दिया। कहा नहीं जा सकता कि भाजपा और संघ के अंदरूनी क्षेत्रों में ताजा बहस को लेकर क्या प्रतिक्रिया है, पर एनडीए के घटक दलों, विशेषकर जद-यू की ओर से जो कुछ कहा गया, वह ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है। जनता जानती है कि भावी प्रधानमंत्री को लेकर यूपीए में चाहे भ्रम की कोई स्थिति हो, गैर-यूपीए दलों में तो इस शीर्ष पद के लिए कई उम्मीदवार इस समय मौजूद हैं।
इन मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने-अपने राज्यों में उपवास पर बैठना ही बस शेष है। चर्चा यहां चूंकि नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए मिशन की हो रही है, लिहाजा उनकी दृष्टि से देखा जाए तो अन्ना के आंदोलन से उत्पन्न हुए माहौल का लाभ लेने के लिए एक रामलीला मैदान अहमदाबाद में भी खड़ा करना जरूरी हो गया था। अपना उपवास तोड़ते हुए नरेंद्र मोदी ने कटाक्ष किया था कि देश को बड़े ‘सपने’ देखने की आदत नहीं है।
‘राष्ट्र की सेवा’ के अपने ‘सपने’ को कोई रूप देने सेपहले नरेंद्र मोदी के लिए जरूरी था कि भाजपा व एनडीए में अपने नेतृत्व की संभावनाओं को सद्भावना मिशन के जरिए ठीक तरह से टटोल लें। इतिहास गवाह है कि कोई एक चौथाई सदी तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके ज्योति बसु के समक्ष जब प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का अवसर उत्पन्न हुआ तो उनकी ही पार्टी के कतिपय लोगों का विरोध आड़े आ गया था।
मुश्किल है गरीबों की पहचान? हर्ष मंदर
यदि आप किसी गांव में जाएं और ग्रामीणों से पूछें कि यहां रहने वाले लोगों में से कौन गरीब हैं, तो उनके लिए इस सवाल का जवाब देना कठिन नहीं होगा। शायद वे किसी दृष्टिहीन विधवा का नाम बताएं, या किसी बुजुर्ग दंपती की ओर इशारा करें, जो भीख मांगकर पेट भरते हैं, या कर्ज के बोझ तले दबे किन्हीं किसानों का उल्लेख करें।
वे गरीबों की अपनी सूची में पिछड़ी जाति के भूमिहीन खेतिहरों को भी शामिल कर सकते हैं, जो हर साल कई महीनों तक शहर के ईंट भट्टों में काम करते हैं, या शायद उस छोटे किसान को, जिसका जीवन अच्छे मानसून पर निर्भर है, या उन लोगों को, जिनके बच्चे स्कूल जाने के बजाय बीड़ियां बनाते हैं।
शहर के लोग गरीबों के बारे में पूछने पर झुग्गी-झोपड़ियों या निर्माण स्थलों या फुटपाथों का पता बताएंगे, क्योंकि कचरा बीनने वाले, मजदूरी करने वाले, रिक्शा चलाने वाले या भीख मांगने वाले लोग कमोबेश इन्हीं जगहों पर पाए जाते हैं।
लेकिन जब यही सवाल सरकारी अधिकारियों से पूछा जाता है तो वे ठीक जवाब देने में नाकाम रहते हैं। ग्रामीण निर्धन परिवारों को चिह्न्ति करने के लिए वर्ष 1992, 1997 और 2002 में तीन बार आधिकारिक राष्ट्रीय सर्वेक्षण हो चुके हैं, लेकिन खुद सरकार ही यह स्वीकारती है कि आधे से अधिक गरीबों को चिह्न्ति नहीं किया जा सका है।
यदि आप गरीब हैं तो बहुत संभावना है कि सरकार की सूची में आप खुद का नाम न पाएं! इसकी वजह यह है कि जब सरकार गरीबों के बारे में पूछताछ करती है तो उसके प्रश्न प्रासंगिक या स्पष्ट नहीं होते। इन प्रश्नों के उत्तर पर ही यह निर्भर करता है कि किसी परिवार को सस्ता अनाज या नि:शुल्क दवाइयां या बैंक ऋण मिलेगा या नहीं।
इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि ‘सरकारी गरीबों’ की इस ‘जादुई’ फेहरिस्त में शामिल होने के लिए हर तरफ हो-हल्ला मचा रहता है। भीषण असमानता और भ्रष्ट-गैरजिम्मेदार अफसरशाही से ग्रस्त एक समाज में गरीबों की सूचियों का इतना त्रुटिपूर्ण होना अप्रत्याशित नहीं है।
समस्या यहां से शुरू होती है कि सरकार उपभोग और व्यय के त्रुटिपूर्ण आकलनों के आधार पर गरीबों की कुल संख्या का निर्धारण करती है। लेकिन जब यह सवाल सामने आता है कि आखिर ‘कौन’ लोग गरीबों की श्रेणी में आते हैं तो सरकार रास्ता भटक जाती है।
1992 और 1997 में हुए पहले दो राष्ट्रीय सर्वेक्षण निर्धन ग्रामीण परिवारों की आय और उपभोग के आकलनों पर आधारित थे। लेकिन स्वरोजगार की स्थिति में आय का आकलन करना कठिन है। यह स्थिति तब और विकट हो गई, जब गरीबों की सूची में शामिल होने के लिए लोगों ने अपनी आय को कम करके बताना शुरू कर दिया।
2002 में गरीबी के सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के लिए इन मानदंडों को समझदारी का परिचय देते हुए त्याग दिया गया, लेकिन योजना आयोग द्वारा तीसरे राष्ट्रीय सर्वेक्षण के लिए अपनाए गए 13 वास्तविक संकेतकों में से अनेक व्यक्तिपरक और यहां तक कि मनमानीपूर्ण थे।
यदि किसी परिवार के घर की छत पक्की हो, घर में टॉयलेट सुविधा हो, बच्चे स्कूल जाते हों और परिवार के कुछ सदस्य शिक्षित हों, यदि जरूरत के समय परिवार को ऋण मिल जाता हो और परिवार के सदस्यों द्वारा यदा-कदा मांसाहारी भोजन किया जाता हो तो इस बात का पूरा अंदेशा था कि उसे सब्सिडी पर मिलने वाले अनाज या अन्य शासकीय सहायताओं के लिए पात्र न माना जाए। सर्वेक्षण ने चरवाहों, वनाश्रित आदिवासियों और मछुआरों को अपात्र घोषित कर दिया।
अब केंद्र सरकार ग्रामीण निर्धन परिवारों को चिह्न्ति करने के लिए चौथा राष्ट्रीय सर्वेक्षण कराने जा रही है। चूंकि यह सर्वेक्षण भी यह वचन देता है कि वह एक ऐसा कानून पास कराएगा, जो प्रत्येक चिह्न्ति परिवार को क्रमश: 3 रुपए, 2 रुपए और 1 रुपए प्रतिकिलो की दर पर प्रतिमाह 35 किलो चावल, गेहूं और ज्वार-बाजरा मुहैया कराएगा, इसलिए यह और भी जरूरी हो गया है कि इस बार सर्वेक्षण में किसी तरह की कोई चूक न हो। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षो पर ही देश के निर्धनतम ग्रामीण परिवारों द्वारा अस्मिता के साथ अपना जीवन बिताने की संभावनाएं निर्भर करती हैं।
मेरा मानना है कि सर्वेक्षण के दायरे में उन समृद्ध ग्रामीण परिवारों को सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए, जिनके पास बड़ी सिंचित कृषि भूमि हो, तीन या चार मोटरगाड़ियां हो, ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर जैसे कृषि उपकरण हों या जिन्हें दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक वेतन मिलता हो। साथ ही मैं यह भी सुझाव देना चाहूंगा कि सर्वेक्षण में उन सभी परिवारों को स्वत: सम्मिलित कर लिया जाए, जो स्पष्टत: सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचितों की श्रेणी में आते हैं।
ये ऐसे परिवार हैं, जिन्हें ग्रामीण ही आसानी से चिह्न्ति कर सकते हैं। यह निर्धारित करना कठिन है कि किस परिवार की आय कम है या कौन-सा परिवार बहुत कम में गुजारा करता है, लेकिन यदि इसके स्थान पर यह पूछा जाए कि कौन विधवा है, कौन अक्षम है, कौन बंधुआ मजदूर है तो सर्वेक्षण के निष्कर्षो में इतनी अस्पष्टता नहीं होगी।
इन समूहों और वर्गो से संबद्ध अधिकांश व्यक्ति निर्धन और वंचित हैं। यदि इन मानदंडों को लागू किया जाए तो यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सबसे जरूरतमंद लोग इस सूची से बाहर नहीं छूटें। यही ‘सामाजिक समावेश’ नीति है। उन व्यक्तियों और समूहों को शासकीय सहायता की प्राथमिकता के दायरे में लाना सबसे जरूरी हैं, जिन्हें उस सहायता की सख्त दरकार है।
विकास मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ रॉबर्ट चैम्बर्स अक्सर कहते हैं कि अधिकारी गलत फैसले इसलिए लेते हैं, क्योंकि वे निर्धनता के सबसे बड़े विशेषज्ञों की सलाह नहीं लेते और वे हैं स्वयं निर्धनजन! यदि उनकी बात सुनी जाए तो वे सरकार को बड़ी आसानी से बता सकते हैं कि निर्धनों की पहचान कैसे की जाए।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
वे गरीबों की अपनी सूची में पिछड़ी जाति के भूमिहीन खेतिहरों को भी शामिल कर सकते हैं, जो हर साल कई महीनों तक शहर के ईंट भट्टों में काम करते हैं, या शायद उस छोटे किसान को, जिसका जीवन अच्छे मानसून पर निर्भर है, या उन लोगों को, जिनके बच्चे स्कूल जाने के बजाय बीड़ियां बनाते हैं।
शहर के लोग गरीबों के बारे में पूछने पर झुग्गी-झोपड़ियों या निर्माण स्थलों या फुटपाथों का पता बताएंगे, क्योंकि कचरा बीनने वाले, मजदूरी करने वाले, रिक्शा चलाने वाले या भीख मांगने वाले लोग कमोबेश इन्हीं जगहों पर पाए जाते हैं।
लेकिन जब यही सवाल सरकारी अधिकारियों से पूछा जाता है तो वे ठीक जवाब देने में नाकाम रहते हैं। ग्रामीण निर्धन परिवारों को चिह्न्ति करने के लिए वर्ष 1992, 1997 और 2002 में तीन बार आधिकारिक राष्ट्रीय सर्वेक्षण हो चुके हैं, लेकिन खुद सरकार ही यह स्वीकारती है कि आधे से अधिक गरीबों को चिह्न्ति नहीं किया जा सका है।
यदि आप गरीब हैं तो बहुत संभावना है कि सरकार की सूची में आप खुद का नाम न पाएं! इसकी वजह यह है कि जब सरकार गरीबों के बारे में पूछताछ करती है तो उसके प्रश्न प्रासंगिक या स्पष्ट नहीं होते। इन प्रश्नों के उत्तर पर ही यह निर्भर करता है कि किसी परिवार को सस्ता अनाज या नि:शुल्क दवाइयां या बैंक ऋण मिलेगा या नहीं।
इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि ‘सरकारी गरीबों’ की इस ‘जादुई’ फेहरिस्त में शामिल होने के लिए हर तरफ हो-हल्ला मचा रहता है। भीषण असमानता और भ्रष्ट-गैरजिम्मेदार अफसरशाही से ग्रस्त एक समाज में गरीबों की सूचियों का इतना त्रुटिपूर्ण होना अप्रत्याशित नहीं है।
समस्या यहां से शुरू होती है कि सरकार उपभोग और व्यय के त्रुटिपूर्ण आकलनों के आधार पर गरीबों की कुल संख्या का निर्धारण करती है। लेकिन जब यह सवाल सामने आता है कि आखिर ‘कौन’ लोग गरीबों की श्रेणी में आते हैं तो सरकार रास्ता भटक जाती है।
1992 और 1997 में हुए पहले दो राष्ट्रीय सर्वेक्षण निर्धन ग्रामीण परिवारों की आय और उपभोग के आकलनों पर आधारित थे। लेकिन स्वरोजगार की स्थिति में आय का आकलन करना कठिन है। यह स्थिति तब और विकट हो गई, जब गरीबों की सूची में शामिल होने के लिए लोगों ने अपनी आय को कम करके बताना शुरू कर दिया।
2002 में गरीबी के सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के लिए इन मानदंडों को समझदारी का परिचय देते हुए त्याग दिया गया, लेकिन योजना आयोग द्वारा तीसरे राष्ट्रीय सर्वेक्षण के लिए अपनाए गए 13 वास्तविक संकेतकों में से अनेक व्यक्तिपरक और यहां तक कि मनमानीपूर्ण थे।
यदि किसी परिवार के घर की छत पक्की हो, घर में टॉयलेट सुविधा हो, बच्चे स्कूल जाते हों और परिवार के कुछ सदस्य शिक्षित हों, यदि जरूरत के समय परिवार को ऋण मिल जाता हो और परिवार के सदस्यों द्वारा यदा-कदा मांसाहारी भोजन किया जाता हो तो इस बात का पूरा अंदेशा था कि उसे सब्सिडी पर मिलने वाले अनाज या अन्य शासकीय सहायताओं के लिए पात्र न माना जाए। सर्वेक्षण ने चरवाहों, वनाश्रित आदिवासियों और मछुआरों को अपात्र घोषित कर दिया।
अब केंद्र सरकार ग्रामीण निर्धन परिवारों को चिह्न्ति करने के लिए चौथा राष्ट्रीय सर्वेक्षण कराने जा रही है। चूंकि यह सर्वेक्षण भी यह वचन देता है कि वह एक ऐसा कानून पास कराएगा, जो प्रत्येक चिह्न्ति परिवार को क्रमश: 3 रुपए, 2 रुपए और 1 रुपए प्रतिकिलो की दर पर प्रतिमाह 35 किलो चावल, गेहूं और ज्वार-बाजरा मुहैया कराएगा, इसलिए यह और भी जरूरी हो गया है कि इस बार सर्वेक्षण में किसी तरह की कोई चूक न हो। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षो पर ही देश के निर्धनतम ग्रामीण परिवारों द्वारा अस्मिता के साथ अपना जीवन बिताने की संभावनाएं निर्भर करती हैं।
मेरा मानना है कि सर्वेक्षण के दायरे में उन समृद्ध ग्रामीण परिवारों को सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए, जिनके पास बड़ी सिंचित कृषि भूमि हो, तीन या चार मोटरगाड़ियां हो, ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर जैसे कृषि उपकरण हों या जिन्हें दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक वेतन मिलता हो। साथ ही मैं यह भी सुझाव देना चाहूंगा कि सर्वेक्षण में उन सभी परिवारों को स्वत: सम्मिलित कर लिया जाए, जो स्पष्टत: सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचितों की श्रेणी में आते हैं।
ये ऐसे परिवार हैं, जिन्हें ग्रामीण ही आसानी से चिह्न्ति कर सकते हैं। यह निर्धारित करना कठिन है कि किस परिवार की आय कम है या कौन-सा परिवार बहुत कम में गुजारा करता है, लेकिन यदि इसके स्थान पर यह पूछा जाए कि कौन विधवा है, कौन अक्षम है, कौन बंधुआ मजदूर है तो सर्वेक्षण के निष्कर्षो में इतनी अस्पष्टता नहीं होगी।
इन समूहों और वर्गो से संबद्ध अधिकांश व्यक्ति निर्धन और वंचित हैं। यदि इन मानदंडों को लागू किया जाए तो यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सबसे जरूरतमंद लोग इस सूची से बाहर नहीं छूटें। यही ‘सामाजिक समावेश’ नीति है। उन व्यक्तियों और समूहों को शासकीय सहायता की प्राथमिकता के दायरे में लाना सबसे जरूरी हैं, जिन्हें उस सहायता की सख्त दरकार है।
विकास मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ रॉबर्ट चैम्बर्स अक्सर कहते हैं कि अधिकारी गलत फैसले इसलिए लेते हैं, क्योंकि वे निर्धनता के सबसे बड़े विशेषज्ञों की सलाह नहीं लेते और वे हैं स्वयं निर्धनजन! यदि उनकी बात सुनी जाए तो वे सरकार को बड़ी आसानी से बता सकते हैं कि निर्धनों की पहचान कैसे की जाए।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
जमीन से जुड़े जरूरी सवाल
स्वतंत्रता के इतने सालों के बाद भी लाखों देशवासी और उनके संघर्ष हमारी नजरों से ओझल हैं। भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के कारण लाखों लोगों ने अनगिनत कष्ट सहे, लेकिन उनकी तकलीफों की कहानी कभी भी पूरी तरह सामने नहीं आई। ‘विकास’ की कीमत किसानों और खेतिहर श्रमिकों की अनेक पीढ़ियों को चुकानी पड़ी है। उन्हें बलपूर्वक अपनी धरती से बेदखल करने का अर्थ है अपने सबसे निर्धन अन्न उत्पादकों को सताना, ताकि देश विकास की राह पर आगे बढ़ सके।
कभी-कभी इन दबे-कुचले लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है और हिंसक प्रतिरोध का रूप ले लेता है। हाल के समय में इनके आक्रोश के विस्फोट के कारण सरकारों का उत्थान और पतन भी हुआ है। औद्योगीकरण व शहरीकरण की बेलगाम रफ्तार के कारण यह समस्या और विकट हो जाती है। आज वास्तविक खतरा जिस संसाधन पर है, वह पूंजी नहीं, भूमि है। निजी उद्योगों की भूमि की मांग के दावानल ने निर्धन किसानों की पुश्तैनी जमीनों को निगल लिया है।
गैरलोकतांत्रिक समाजों में औद्योगीकरण-शहरीकरण के नाम पर लोगों को बलपूर्वक उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाता है और उनके प्रतिरोध को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया जाता है, लेकिन भारत तो खुली लोकतांत्रिक व्यवस्था में तेज विकास दर प्राप्त करने का आकांक्षी है। अपनी आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए उसे समावेशी और समतापूर्ण विकास की राह अख्तियार करनी चाहिए।
बीच बहस में है वर्ष 1894 में पास किया गया भूमि अधिग्रहण कानून, जिस पर सरकारें आज भी अमल करती हैं। यह औपनिवेशिक कानून इस सिद्धांत का पक्षधर है कि देश की समस्त भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यसत्ता का ही पूर्ण स्वामित्व हो। लेकिन इतने सालों में यह कानून प्रभावितों के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। इसकी प्रक्रिया अपारदर्शितापूर्ण है और यह न तो प्रभावितों को उपयुक्त मुआवजा देता है और न ही उनके पुनर्वास संबंधी अधिकारों का संरक्षण करता है।
इसके स्थान पर एक न्यायपूर्ण, मानवीय और पारदर्शी कानून की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। सरकार ‘सार्वजनिक हित’ का हवाला देकर भूमि अधिग्रहण करती है, लेकिन सार्वजनिक हित वास्तव में क्या है, इसके निर्धारण का अधिकार केवल किसी नौकरशाह या अधिकारी के पास ही होता है। एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की औपनिवेशिक परंपराओं को समाप्त करना जरूरी है। सरकार को प्रभावितों के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में सार्वजनिक हित से क्या आशय है और कृषियोग्य भूमि के अधिग्रहण की जरूरत क्यों है।
मौजूदा कानून के तहत भूमि अधिग्रहण पर दिए जाने वाले मुआवजे का निर्धारण पिछले तीन सालों के दौरान भूमि पंजीयन की सेल डीड्स के आधार पर किया जाता है। यह मुआवजा मौजूदा मूल्य दरों से बहुत कम होता है। देश के ज्यादातर हिस्सों में लोग स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए जमीनों का रजिस्ट्रेशन कम भाव में कराते हैं। इसीलिए मुआवजे का निर्धारण भूमि के पंजीबद्ध विक्रय मूल्य से अधिक किया जाना चाहिए। रियल एस्टेट बिल्डर किसानों से जितनी कीमत पर भूमि खरीदते हैं, उससे दसियों गुना अधिक दाम पर उसे बेचते हैं।
इसलिए भी भूमि अधिग्रहण के लिए उचित मुआवजा प्रणाली पर विचार किया जाना जरूरी है। अधिग्रहण के दस वर्ष बाद भूमि पुन: बेचे जाने की स्थिति में हर बार उन्हें २क् फीसदी अधिमूल्यित राशि भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। चूंकि ग्रामीण आमतौर पर बड़ी नगद राशि का उचित नियोजन या निवेश करना नहीं जानते, इसलिए उन्हें मुआवजे की पूरी राशि मासिक भुगतान के रूप में दी जानी चाहिए, जिस पर उन्हें 12 फीसदी सालाना ब्याज दिया जाए। मुद्रास्फीति के अनुसार इस ब्याज को समायोजित किया जाना भी जरूरी है।
भूमि अधिग्रहण की सबसे ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ती है, जो स्वयं भूमिस्वामी नहीं हैं, लेकिन जिनकी आजीविका भूमि पर निर्भर है। मौजूदा कानून में इन लोगों के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें सुधार जरूरी है। भूमि आश्रित श्रमिकों व इस तरह के अन्य व्यक्तियों को दस दिन न्यूनतम मजदूरी के समान प्रतिमाह पारितोषिक दिया जाना चाहिए। एक विवादित मसला यह भी है कि क्या सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह निजी उद्योगों के लिए भूमि अधिगृहीत करे।
एक धारणा यह है कि जो निजी उद्यम सार्वजनिक हित के होते हैं, उन्हें इससे अलग रखा जाना चाहिए, क्योंकि सरकार को निजी मुनाफे का एजेंट नहीं बनना चाहिए। प्रभावित व्यक्तियों के पास यह विकल्प होना चाहिए कि वे अपनी भूमि बेचना चाहते हैं या नहीं। एक अन्य धारणा यह भी है कि उद्योग भी अपने आपमें सार्वजनिक हित का साधन हैं, क्योंकि इससे रोजगार के अवसर निर्मित होते हैं और इसीलिए सरकार को भूमि अधिग्रहण में सहायता करनी चाहिए।
लेकिन एक मध्यमार्ग भी हो सकता है। यदि सरकार ने अधिग्रहण की प्रक्रियाओं का नियमन नहीं किया तो निजी कंपनियां असंगठित और छोटे उत्पादकों का शोषण करेंगी और भूमिहीन श्रमिकों को भी किसी तरह की राहत नहीं मिलेगी। ऐसे में सरकार को यह करना चाहिए कि वह निजी उद्योगों को किसानों से सीधे जमीन खरीदने से रोके और उन्हें नए न्यायपूर्ण कानून के तहत मुआवजे की ऊंची दर और पुनर्वास की व्यवस्था प्रदान करने के लिए बाध्य किया जाए।
आज हमारे पास यह मौका है कि हम अपने लाखों किसानों और श्रमिकों को औद्योगिक व शहरी विकास की बलि चढ़ने से रोकें। संतोष की बात यह है कि धीरे-धीरे देश जाग रहा है और अन्यायपूर्ण स्थितियों के प्रति एक अपेक्षित नैतिक बोध से भर रहा है।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
कभी-कभी इन दबे-कुचले लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है और हिंसक प्रतिरोध का रूप ले लेता है। हाल के समय में इनके आक्रोश के विस्फोट के कारण सरकारों का उत्थान और पतन भी हुआ है। औद्योगीकरण व शहरीकरण की बेलगाम रफ्तार के कारण यह समस्या और विकट हो जाती है। आज वास्तविक खतरा जिस संसाधन पर है, वह पूंजी नहीं, भूमि है। निजी उद्योगों की भूमि की मांग के दावानल ने निर्धन किसानों की पुश्तैनी जमीनों को निगल लिया है।
गैरलोकतांत्रिक समाजों में औद्योगीकरण-शहरीकरण के नाम पर लोगों को बलपूर्वक उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाता है और उनके प्रतिरोध को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया जाता है, लेकिन भारत तो खुली लोकतांत्रिक व्यवस्था में तेज विकास दर प्राप्त करने का आकांक्षी है। अपनी आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए उसे समावेशी और समतापूर्ण विकास की राह अख्तियार करनी चाहिए।
बीच बहस में है वर्ष 1894 में पास किया गया भूमि अधिग्रहण कानून, जिस पर सरकारें आज भी अमल करती हैं। यह औपनिवेशिक कानून इस सिद्धांत का पक्षधर है कि देश की समस्त भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यसत्ता का ही पूर्ण स्वामित्व हो। लेकिन इतने सालों में यह कानून प्रभावितों के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। इसकी प्रक्रिया अपारदर्शितापूर्ण है और यह न तो प्रभावितों को उपयुक्त मुआवजा देता है और न ही उनके पुनर्वास संबंधी अधिकारों का संरक्षण करता है।
इसके स्थान पर एक न्यायपूर्ण, मानवीय और पारदर्शी कानून की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। सरकार ‘सार्वजनिक हित’ का हवाला देकर भूमि अधिग्रहण करती है, लेकिन सार्वजनिक हित वास्तव में क्या है, इसके निर्धारण का अधिकार केवल किसी नौकरशाह या अधिकारी के पास ही होता है। एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की औपनिवेशिक परंपराओं को समाप्त करना जरूरी है। सरकार को प्रभावितों के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में सार्वजनिक हित से क्या आशय है और कृषियोग्य भूमि के अधिग्रहण की जरूरत क्यों है।
मौजूदा कानून के तहत भूमि अधिग्रहण पर दिए जाने वाले मुआवजे का निर्धारण पिछले तीन सालों के दौरान भूमि पंजीयन की सेल डीड्स के आधार पर किया जाता है। यह मुआवजा मौजूदा मूल्य दरों से बहुत कम होता है। देश के ज्यादातर हिस्सों में लोग स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए जमीनों का रजिस्ट्रेशन कम भाव में कराते हैं। इसीलिए मुआवजे का निर्धारण भूमि के पंजीबद्ध विक्रय मूल्य से अधिक किया जाना चाहिए। रियल एस्टेट बिल्डर किसानों से जितनी कीमत पर भूमि खरीदते हैं, उससे दसियों गुना अधिक दाम पर उसे बेचते हैं।
इसलिए भी भूमि अधिग्रहण के लिए उचित मुआवजा प्रणाली पर विचार किया जाना जरूरी है। अधिग्रहण के दस वर्ष बाद भूमि पुन: बेचे जाने की स्थिति में हर बार उन्हें २क् फीसदी अधिमूल्यित राशि भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। चूंकि ग्रामीण आमतौर पर बड़ी नगद राशि का उचित नियोजन या निवेश करना नहीं जानते, इसलिए उन्हें मुआवजे की पूरी राशि मासिक भुगतान के रूप में दी जानी चाहिए, जिस पर उन्हें 12 फीसदी सालाना ब्याज दिया जाए। मुद्रास्फीति के अनुसार इस ब्याज को समायोजित किया जाना भी जरूरी है।
भूमि अधिग्रहण की सबसे ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ती है, जो स्वयं भूमिस्वामी नहीं हैं, लेकिन जिनकी आजीविका भूमि पर निर्भर है। मौजूदा कानून में इन लोगों के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें सुधार जरूरी है। भूमि आश्रित श्रमिकों व इस तरह के अन्य व्यक्तियों को दस दिन न्यूनतम मजदूरी के समान प्रतिमाह पारितोषिक दिया जाना चाहिए। एक विवादित मसला यह भी है कि क्या सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह निजी उद्योगों के लिए भूमि अधिगृहीत करे।
एक धारणा यह है कि जो निजी उद्यम सार्वजनिक हित के होते हैं, उन्हें इससे अलग रखा जाना चाहिए, क्योंकि सरकार को निजी मुनाफे का एजेंट नहीं बनना चाहिए। प्रभावित व्यक्तियों के पास यह विकल्प होना चाहिए कि वे अपनी भूमि बेचना चाहते हैं या नहीं। एक अन्य धारणा यह भी है कि उद्योग भी अपने आपमें सार्वजनिक हित का साधन हैं, क्योंकि इससे रोजगार के अवसर निर्मित होते हैं और इसीलिए सरकार को भूमि अधिग्रहण में सहायता करनी चाहिए।
लेकिन एक मध्यमार्ग भी हो सकता है। यदि सरकार ने अधिग्रहण की प्रक्रियाओं का नियमन नहीं किया तो निजी कंपनियां असंगठित और छोटे उत्पादकों का शोषण करेंगी और भूमिहीन श्रमिकों को भी किसी तरह की राहत नहीं मिलेगी। ऐसे में सरकार को यह करना चाहिए कि वह निजी उद्योगों को किसानों से सीधे जमीन खरीदने से रोके और उन्हें नए न्यायपूर्ण कानून के तहत मुआवजे की ऊंची दर और पुनर्वास की व्यवस्था प्रदान करने के लिए बाध्य किया जाए।
आज हमारे पास यह मौका है कि हम अपने लाखों किसानों और श्रमिकों को औद्योगिक व शहरी विकास की बलि चढ़ने से रोकें। संतोष की बात यह है कि धीरे-धीरे देश जाग रहा है और अन्यायपूर्ण स्थितियों के प्रति एक अपेक्षित नैतिक बोध से भर रहा है।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
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