मेरे जन्मस्थान, एक छोटे शहर के अकेलेपन और बोर्डिंग स्कूल के बंद कपाटों वाले बरसों में स्वप्न अंग्रेजी के पांच अक्षरों वाला एक शब्द हुआ करता था- टाइगर। जब जोशीली हरी आंख के साथ रेडियो टेस्ट क्रिकेट के लिए हमारा बुनियादी प्रवेशपत्र होता था, उन दिनों मंसूर अली खान पटौदी का जादू क्रिकेट कमेंट्री के लिए पारित गप्पबाजी पर छाया होता था।
द्वितीयक ज्ञान मिलता था श्वेत-श्याम अखबारों की धूसर तस्वीरों से। रेडियो यादों में चला गया। नील हार्वे, रिकी बेनॉड, वेस हॉल, गारफील्ड सोबर्स और फ्रेंक वोरेल जैसे साथियों के साथ फोटोग्राफ बड़े लगाव से स्क्रैपबुक में संरक्षित कर लिया गया। मैंने वोरेल को इस लब्धप्रतिष्ठित कंपनी में इसलिए नहीं रखा है कि वे बल्लेबाजी कर सकते थे, बल्कि इसलिए कि वे नेतृत्व कर सकते थे।
1960 के दशक तक ‘नवाब’ की पदवी एक कमजोर हास्यचित्र में बदल चुकी थी, 18वीं सदी के चमकदार दिनों का एक दीन-हीन वंशज- पहले अंग्रेजों के पिनपिने चापलूस के तौर पर अवनत हुआ और फिर आजादी बाद के नेताओं के अहंकारी पिछलग्गू के रूप में।
यहां तक कि हिंदी सिनेमा ने भी ‘छोटे नवाब’पर हंसना शुरू कर दिया, जब तक कि यह शोकग्रस्त आत्मदया में नहीं धकेल दिया गया, जैसे कि ‘मेरे महबूब’ में नवाब साहब अपने बचे-खुचे बेहद निर्थक सम्मान की रक्षा के लिए अपने कीमती माल-असबाब की नीलामी करते हैं।
फिर इंदिरा गांधी का आगमन हुआ। 1969 में उन्होंने नवाबों और राजाओं को अवैध घोषित कर दिया। इन नवाबों और राजाओं का प्रचंड रोष उनकी असमर्थता की तरह ही बचकाना था। जब उन्होंने 1971 के आम चुनावों में श्रीमती गांधी को चुनौती देने की कोशिश की, तो उन्हें पता चला कि वे बदलते हुए भारत से कितनी दूर हो गए हैं।
श्रीमती गांधी को सत्ता तक पहुंचाकर इस चुनाव ने एक नया अनुक्रम अभिषिक्त किया। भारत की नई रानी इंदिरा गांधी थीं, लोकतंत्र की बेगम। टाइगर अपने किसी भी अन्य भाई-बंधु जैसे ही परेशान थे, पर उन्होंने किसी भी तरह के व्यक्तिगत सदमे को बहुत बारीकी से तराशे हुए हास्यबोध के पीछे छुपा लिया।
इस हास्यबोध में व्यावहारिक लतीफों के जबरदस्त मजाक के घालमेल के साथ ही एक भावहीन ब्रिटिश मुखौटा भी था। वे एक आदर्श इंडो-एंग्लियन थे। स्कॉटिश जंगलों में शिकारी की जैकेट में भी उतने ही सहज, जितने कि शानदार शेरवानी में।
उनके नटखट मजाकों के लिए रणनीति अक्सर खुशगवार बार के पार गजब की होती थी और लंबे समय बाद, जब तक कि शिकार झांसे में न आ जाए, तब तक रहस्य को बड़ी सतर्कता से बचाकर रखा जाता था। बेशक यह धोखा बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं होता था।
यह बड़ा त्रासद है कि उनके जीवन का आखिरी प्रसंग एमसीसी की ओर से अनदेखी थी, जिसने इन गर्मियों में भारत-इंग्लैंड सीरीज के बाद पारंपरिक पटौदी ट्रॉफी वितरित करने से इंकार कर दिया था। भारतीय राजकुमार एक रेशमी बंधन के जरिए इंग्लिश क्रिकेट के लिए बाध्य थे।
एक स्तर पर, इसने उन्हें नए शासक वर्ग के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों में रखा, जैसा कि मुगल काल में शिकार ने किया था। इसके साथ ही यह शाही प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए एक उपयुक्त थिएटर के रूप में भी सामने आया।
इसने न तो अंग्रेजों को आशंकित किया और न ही बहुत गौण महत्व वाले भारतीयों को सम्मिलित किया। एक नवाब के लिए बहुत ज्यादा सफल बिजनेस एक्जीक्यूटिव बनना भी प्रतिष्ठा के खिलाफ रहा होता- यहां तक कि कोई प्रतिष्ठित कंपनी भी भारतीय कुलीन की प्रतिष्ठा के लिए नाकाफी थी।
सेना एक सम्माजनक अभयारण्य था, लेकिन बहुत कम पारितोषिक के लिए बहुत ज्यादा अनुशासन की दरकार थी। राजनीति भी एक विकल्प थी, लेकिन उसमें जनसाधारण के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होता है।
ग्लैमर के साथ टाइगर का एक न्यायसंगत नाता था। वे पाखंडी नहीं थे, इसलिए उन्होंने ग्लैमर का कभी तिरस्कार नहीं किया। लेकिन वे कभी आत्ममुग्ध भी नहीं हुए। रनों की कमी के कई कारण गिनाए गए हैं: उन्होंने सिर्फ छह शतक लगाए।
लोकप्रिय सिद्धांत यह है कि जब वे ऑक्सफोर्ड में थे, तभी एक त्रासद कार दुर्घटना में उन्हें एक आंख गंवानी पड़ी। मुझमें यह मानने की प्रवृत्ति है कि उन्हें कोई परेशानी नहीं रही होगी। क्रिकेट एक खेल था, न कि मजहब। उन्होंने आंकड़ों की वेदी पर खेल के आनंद की बलि नहीं दी।
पटौदी अपनी आकर्षक स्टाइल और क्रीज पर धीर-गंभीर बर्ताव के कारण माने हुए टाइगर बने। उनकी शांति तब तक रहती थी, जब तक कि सहज झपट्टे का वक्त नहीं आ जाता था। उन्होंने टाइगर की मुस्कान भी धारण की, एक कंपन, जो कभी-कभार ही चेहरे पर बुलबुले की तरह उभरता है।
इस टाइगर को विशेष दर्जा मिला था: रॉयल बंगाल, एक विशेषण जिसे कोलकाता ने खुशी-खुशी स्वीकार किया, जब उन्होंने महान टैगोर परिवार की प्रतिभाशाली पुत्री शर्मिला से विवाह किया।
मैं हैरान हूं कि टाइगर के निधन के बाद जैसी बनावटी बोलियां उभरी हैं, उन पर खुद टाइगर ने कैसी प्रतिक्रिया दी होती। कंधों को सिकोड़ना, सिर डुलाना या ऊब की आधी मुस्कान। उन्हें रूढ़ उक्तियों से नफरत थी, इसलिए क्या मेहरबानी करके हम ‘क्रिकेट और निर्धन हो गया’ जैसी बकवास का त्याग कर सकते हैं?
टाइगर ने पिछली दफा जब बल्ला थामा था, उसके बाद से क्रिकेट नकदी और तकनीक, दोनों मामलों में असीमित रूप से समृद्ध हुआ है। लेकिन उनके निधन के बाद दुनिया निश्चित तौर पर निर्धन हुई है।
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